जोधपुर 27 मई। आसाराम उर्फ आसुमल की यौन शोषण मामले में प्राकृतिक जीवन तक आजीवन कारावास की सजा के खिलाफ हाईकोर्ट में दायर अपील पर बुधवार को फैसला आया. हाईकोर्ट के जस्टिस अरुण कुमार मोंगा और योगेंद्र कुमार पुरोहित की खंडपीठ ने अपने फैसले में आसाराम को पूरी तरह से आरोप मुक्त नहीं किया है. उनकी सजा खत्म करने की अपील खारिज हुई है, लेकिन पॉक्सो एक्ट की गैर जमानती अपराध, आईपीसी की गैंग रेप और षड्यंत्र कर अपराध करने से जुड़ी धाराओं में दोषी नहीं माना है. खंडपीठ ने भारतीय दंड संहिता की दुष्कर्म, पॉक्सो की यौन शोषण और जेजे एक्ट सहित अन्य धाराओं को लेकर लोअर कोर्ट द्वारा दिए गए फैसले को सही ठहराया है, यानी सजा बरकरार रहेगी.
खंडपीठ ने आसाराम के सेवादार शरतचंद्र और शिल्पी को पूरी तरह से आरोप मुक्त कर दिया है. इस मामले में पीड़िता के अधिवक्ता पीसी सोलंकी ने बताया कि कोर्ट ने सजा पर रोक नहीं लगाई है. आजीवन कारावास की सजा बरकरार है, राहत जरूर दी है. सोलंकी ने बताया कि बरी किए गए आरोपियों के आदेश के खिलाफ पीड़िता से बात कर हम सुप्रीम कोर्ट जाएंगे. इस फैसले के बाद आसाराम को अब जेल में सरेंडर करना होगा.
20 अप्रैल को आसाराम, शरतचंद्र और शिल्पी की ओर से सजा के खिलाफ दायर अपीलों पर सुनवाई पूरी हुई थी. आसाराम और उसके सेवादारों की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता देवदत्त कामत, अधिवक्ता दीपक मेनारिया और यशपाल सिंह राजपुरोहित ने पक्ष रखा. राज्य सरकार की ओर से अतिरिक्त महाधिवक्ता दीपक चौधरी और पीड़िता की ओर से अधिवक्ता पीसी सोलंकी ने बहस की थी. सभी पक्षों की दलीलें सुनने के बाद हाईकोर्ट ने 20 अप्रैल 2026 को फैसला सुरक्षित रख लिया था.
25 अप्रैल 2018 को विशेष अदालत ने नाबालिग से दुष्कर्म मामले में आसाराम को शेष प्राकृतिक जीवन तक आजीवन कारावास की सजा सुनाई थी. वहीं, सहआरोपी शिल्पी और शरतचंद को 20-20 वर्ष के कठोर कारावास की सजा दी गई थी. इसी निर्णय को चुनौती देते हुए तीनों ने राजस्थान हाईकोर्ट में अपील दायर की थी.

