नयी दिल्ली, 07 अप्रैल (दि)। दिल्ली के पूर्व मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल गत दिवस दिल्ली उच्च न्यायालय में व्यक्तिगत रूप से पेश हुए और न्यायमूर्ति स्वर्ण कांता शर्मा को आबकारी नीति मामले में उन्हें तथा अन्य सभी आरोपियों को बरी किए जाने के फैसले के खिलाफ केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (सीबीआई) की ओर से दायर याचिका पर सुनवाई से अलग किए जाने का अनुरोध किया।
न्यायमूर्ति शर्मा ने खुद को मामले की सुनवाई से अलग किए जाने की केजरीवाल की अर्जी को रिकॉर्ड में ले लिया और इसकी सुनवाई 13 अप्रैल को तय की। सीबीआई की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने दलील दी कि अदालत नौटंकी का मंच नहीं है और अगर केजरीवाल मामले में व्यक्तिगत रूप से पेश होना चाहते हैं, तो उन्हें अपने वकील को हटा देना चाहिए।
मेहता ने केजरीवाल की अर्जी पर कड़ी आपत्ति जताई और कहा कि पूर्व मुख्यमंत्री के आरोप बेबुनियाद एवं अपमानजनक हैं। उन्होंने उच्च न्यायालय को बताया कि बरी किए गए सात आरोपियों ने न्यायामूर्ति शर्मा को इस मामले की सुनवाई से अलग करने के अनुरोध को लेकर अदालत का रुख किया है।
न्यायमूर्ति शर्मा ने कहा कि अगर कोई और अर्जी दाखिल करना चाहता है, तो कृपया ऐसा करें, ताकि मैं इस पर एक बार में अंतिम फैसला ले सकूं। निचली अदालत ने 27 फरवरी को केजरीवाल, पूर्व उपमुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया और 21 अन्य आरोपियों को बरी कर दिया था और सीबीआई को फटकार लगाते हुए कहा था कि उसका मामला न्यायिक कसौटी पर खरा नहीं उतर सका और पूरी तरह से बेबुनियाद साबित हुआ।
न्यायमूर्ति शर्मा ने निचली अदालत के फैसले के खिलाफ सीबीआई की याचिका पर नौ मार्च को सभी 23 आरोपियों को नोटिस जारी किया। नोटिस में कहा गया कि आरोप तय करने के चरण में निचली अदालत की कुछ टिप्पणियां और निष्कर्ष प्रथम दृष्टया त्रुटिपूर्ण प्रतीत होते हैं तथा उन पर विचार किए जाने की जरूरत है।
न्यायमूर्ति शर्मा ने आबकारी नीति मामले में सीबीआई के जांच अधिकारी के खिलाफ विभागीय कार्रवाई शुरू करने के सिलसिले में निचली अदालत की सिफारिश पर भी रोक लगा दी थी। बाद में दिल्ली उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश डीके उपाध्याय ने सीबीआई की याचिका को न्यायमूर्ति शर्मा से किसी अन्य न्यायाधीश को स्थानांतरित करने के केजरीवाल के अनुरोध को ठुकरा दिया। उन्होंने कहा कि इस मामले की सुनवाई से खुद को अलग करने का निर्णय संबंधित न्यायाधीश को लेना होगा।
केजरीवाल, सिसोदिया और अन्य आरोपियों ने 11 मार्च को दायर अर्जी में दावा किया कि इस बात की “प्रबल, वास्तविक और उचित आशंका” है कि न्यायमूर्ति शर्मा के समक्ष मामले की सुनवाई निष्पक्ष एवं तटस्थ नहीं होगी।
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