हमारी सरकारें चुनावी घोषणाओं और जनहित की योजनाओं का क्रियान्वयन मिलने वाले राजस्व से करती है। यह सभी जानते हैं। लेकिन उसके बावजूद इस अत्यंत महत्वपूर्ण और सरकार की आर्थिक मजबूती का माध्यम राजस्व चोरी की खबरें ज्यादातर विभागों से संबंध पढ़ने सुनने को मिलती हैं। दस रुपये के स्टांप पर करोड़ों की संपत्ति के लेनदेन में राजस्व की चोरी स्पष्ट नजर आती है। एक खबर पढ़ी थी कि सौ रुपये के स्टांप पर बड़े बड़े ठेके लिये जा रहे थे। अगर ध्यान से समीक्षा की जाए तो यह करोड़ों के स्टांप घपले का खेल नहीं है इसमें अरबो रुपये के घपले की संभावना है और यह खेल वो करते हैंं तो उच्च से उच्च अधिकारी के साथ बैठकर खाना खाते हैं या रात को गिलास टकराते हैँ। वरना सब जानते हैं कि सामने वाला क्या रहाहै और उसमें कितना नुकसान सरकार को हो रहा हैं। जानकारों का कहना है कि जनप्रतिनिधियों के इर्द गिर्द घूमने वालों के द्वारा ज्यादातर इस तरह के प्रकरणों को ज्यादा अंजाम दिया जाता है। लोग बताते हैं कि यह जनप्रतिनिधियों के नाम का दबाव बनाकर अफसरों को खामोश रहने को मजबूर करते हैँ और सुविधा शुल्क भी पहुंचा देते हैं। अगर सरकार दो दशक में यूपी समेत देश में बड़े कॉलोनाइजरों जिन्होंने कच्ची कॉलोनियां काटी और बिना मानचित्र के निर्माण कर लिए वो किसानों से एग्रीमेंट कर लेते हैं कि इतना रुपया एडवांस दिया और जैसे जैसे प्लॉट मकान बिकते रहेंगे तो भुगतान होता रहेगा। ऐेसे मामलों में एक एक रजिस्ट्री में कई लाख के स्टांप मिलना चाहिए था उसकी चोरी हो रही बताई जा रही है। क्योंकि बेचता बिल्डर है और रजिस्ट्री किसान व जमींदार कराता है। शायद इसलिए यूपी में पावर अटॉर्नी बंद की गई थी। तब बिल्डर दूसरे प्रदेशों में जाकर करने लगे तो उस पर भी रोक लगीऔर अब विश्वास की दुहाई देकर रजिस्टर्ड एग्रीमेंट कर जमीन की खरीद फरोख्त कर लाखों की स्टांप चोरी करते हैँ। तीन दशक पूर्व मेरे द्वारा राज्यपाल मोतीलाल वोहरा के सामने नकली स्टांप का मुददा उठाया गया था जिस पर जांच के आदेश हुए थे और परिणाम आज तक नहीं पता। कहने का आश्य है कि नकली या कम स्टांप लगाने में पकड़े जाने पर दोषी पर कार्रवाई होती है लेकिन अधिकारी बच जाते हैं या कमजोर पैरवी से उनका कुछ नहीं बिगड़ता और सरकार को अरबों रुपये का नुकसान होता रहता है। इसे रोकना है तो बिल्डरों और अधिकारियों पर भी कार्रवाई की जाए तो सरकार की आर्थिक परेशानी दूर होगी।
(प्रस्तुतिः- रवि कुमार बिश्नोई संपादक दैनिक केसर खुशबू टाइम्स मेरठ)
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