देहरादून, 05 मई (ता)। उत्तराखंड के ‘छोटा कैलाश’ कहे जाने वाले आदि कैलाश और रहस्यमयी ओम पर्वत की यात्रा की शुरुआत 1 मई से हो गई है। इस बार की यात्रा न केवल आध्यात्मिक होगी, बल्कि यात्रियों को कुमाऊं के प्रसिद्ध कैंची धाम, जागेश्वर और पाताल भुवनेश्वर जैसे पौराणिक मंदिरों के दर्शन का सौभाग्य भी मिलेगा। श्रद्धालुओं की सुविधा के लिए कुमाऊं मंडल विकास निगम ने तीन अलग-अलग रूट और बजट के अनुसार विशेष पैकेज तैयार किए हैं, ताकि हर भक्त इस पावन यात्रा का हिस्सा बन सके। इस बार अलग-अलग रूट के हिसाब से अलग-अलग पैकेज तैयार किए गए हैं। यात्रा के दौरान श्रद्धालुओं को कई प्रमुख धार्मिक स्थलों के दर्शन का अवसर मिलेगा। इनमें नाभीढांग, काली मंदिर, गौरीकुंड, पांडव सरोवर, कुटी गांव और पार्वती सरोवर प्रमुख हैं। इन स्थानों का धार्मिक और पौराणिक महत्त्व काफी अधिक माना जाता है और हर वर्ष बड़ी संख्या में श्रद्धालु यहां पहुंचते हैं। इसके अलावा इस यात्रा को कुमाऊं के अन्य प्रसिद्ध मंदिरों से भी जोड़ा गया है।
श्रद्धालु इस दौरान कैंची धाम, चितई गोलू मंदिर, जागेश्वर धाम और पाताल भुवनेश्वर जैसे प्रमुख धार्मिक स्थलों के दर्शन भी कर सकेंगे। इससे एक ओर धार्मिक पर्यटन को बढ़ावा मिलेगा, तो दूसरी ओर यात्रियों को उत्तराखंड की समृद्ध धार्मिक परंपरा और स्थानीय संस्कृति को करीब से जानने का अवसर भी मिलेगा। छोटा कैलाश के नाम से भी जाना जाने वाला आदि कैलाश, पंच कैलाश नामक पांच पवित्र पर्वतों में से एक है। इनमें से आदि कैलाश दूसरा सबसे पवित्र पर्वत है, जो उत्तराखंड के पिथौरागढ़ जिले में भारत-तिब्बत सीमा के निकट स्थित है। हिंदू धर्म में आदि कैलाश एक पूजनीय तीर्थ स्थल है और पौराणिक कथाओं एवं दिव्य संबंधों के कारण इसका आध्यात्मिक महत्त्व बहुत अधिक है। समुद्रतल से 6191 मीटर की ऊंचाई पर स्थित है आदि कैलाश। कैलाश मानसरोवर की तरह ही आदि कैलाश की यात्रा अति दुर्गम मानी जाती है। विशेष रूप से इसकी बनावट और भौगोलिक परिस्थितियां इसे कैलाश के समकक्ष बनाती हैं। प्राकृतिक सुंदरता इस क्षेत्र में पूर्ण रूप से फैली हुई है। लोग यहां आकर अपार शांति का अनुभव करते हैं। साधु-संन्यासी तो इस तीर्थ की यात्रा प्राचीन समय से करते आ रहे हैं। किंतु आमजन को इसके बारे में तिब्बत पर चीन के कब्जे के बाद ही पता चला। पहले यात्री केवल कैलाश मानसरोवर की यात्रा करते थे, किंतु जब तिब्बत पर चीन ने अधिकार जमा लिया, तो आदि कैलाश की यात्रा लगभग असंभव सी हो गई। इस क्षेत्र को ज्योलिंगकांग के नाम से भी जाना जाता है।
आदि कैलाश का इतिहास- प्रकृति की अनुपम कृति में भारत का मुकट हिमालय अपनी अद्भुत सुंदरता और रहस्मय कृतियों का भंडार है। चारों लोक में फैली हरियाली और कल-कल करते झरने और चहचहाती चिडिय़ां और चमकती हुई हिमालय श्रृंखलाएं संपूर्ण प्रकृति से परिपूर्ण हिमालय को समर्पित है, जो कैलाश वासी शिव का प्रिय स्थल है। यहां भगवान शिव व माता पार्वती निवास करते हैं। जिनके स्वरूप की समस्त शास्त्रों व वेदों में यथावत पुष्टि की गई है।
ओम पर्वत- पृथ्वी पर आठ पर्वतों पर प्राकृतिक रूप से ú अंकित है, जिनमें से एक को ही खोजा गया है और वह यही ú पर्वत है। इस पर्वत पर बर्फ इस तरह पड़ती है कि ú का आकार ले लेती है। आदि कैलाश यात्रियों को पहले गूंजी पहुंचना पड़ता है। यहां से वे ú पर्वत के दर्शन करने जाते हैं। इसके बाद वापस गूंजी आकर आदि कैलाश की ओर प्रस्थान करते हैं। इस यात्रा के दौरान हिमालय के बहुत से शिखरों के दर्शन होते हैं।
Trending
- मदन मोहन मंदिर की दीवारों से एएसआई ने हटाई काई और कालिख, लौटी सुंदरता
- नूंह में भीषण सड़क हादसे में जालौन के चौकी इंचार्ज समेत पांच पुलिसकर्मियों की मौत
- गंगा एक्सप्रेसवे पर भीषण हादस में 25 यात्री घायल
- कार्य परिषद की बैठक हुई आगरा विश्वविद्यालय में
- चिंता मत करों, हर समस्या का कराएंगे समाधान : सीएम योगी
- प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना के तहत किसानों के खातों में आए 35.60 लाख रुपये
- प्रदेश कैबिनेट ने तबादला नीति 2026-27 को दी मंजूरी
- प्रेम अधिकार है या समर्पण : श्रीश्री रवि शंकर

