नई दिल्ली, 05 मई (ता)। क्या आपने कभी विचार किया है कि जिस सुंदर वस्तु को आप पाने की कोशिश करते हैं, उसे पाते ही उसकी सुंदरता मर क्यों जाती है? हम जिसे प्रेम कहते हैं, अकसर वह अपना अधिकार जमाने की एक कोशिश मात्र होती है। जब आप सौंदर्य को देखते हैं, तो आपके भीतर कुछ घटित होता है। मानो जीवन ऊर्जा का कोई अवरुद्ध स्रोत अचानक खुल जाता हो, जैसे कोई झरना फूट पड़े। वह आपको रोमांच और आनंद से भर देता है और फिर अगला भाव आता है, उसे अपने अधिकार में लेने की इच्छा। आप किसी सुंदर वस्तु को देखते हैं या किसी आकर्षक व्यक्ति को देखते हैं, तो भीतर कुछ जाग उठता है। मन बहुत अच्छा महसूस करता है, लेकिन अगले ही क्षण मन उसे पाने को लालायित हो जाता है। अधिकार की भावना से ही समस्या-यहीं से समस्या शुरू होती है। जिस क्षण आप सौंदर्य को ‘अधिकार’ में लेने की कोशिश करते हैं, उसी क्षण आप उसे कुरूप बना देते हैं। आप देखेंगे, सुंदर पत्नी होने पर भी पुरुष बाहर और सुंदरता खोजता रहता है या स्त्रियां अन्य आकर्षक व्यक्तित्व के पुरुषों की तलाश करती दिखाई देती हैं। इसका अंत कहां है? जिस क्षण आप किसी चीज को पा लेते हैं, उसका आकर्षण समाप्त हो जाता है। फिर अगली खोज शुरू हो जाती है। पूरा जीवन इसी मृगतृष्णा के पीछे दौड़ बन जाता है और यदि आप इस दौड़ में न भागें, यदि खोज न करें, तो जीवन सूना लगने लगता है। न आकर्षण रहता है, न आनंद, न सौंदर्य। जब दौड़ नहीं होती, तो जीवन नीरस प्रतीत होता है।
क्या करें- जब आप सौंदर्य देखें, तो उसे नमन करें, उसके प्रति समर्पित हो जाएं। यदि आप सौंदर्य के प्रति समर्पण नहीं करते, तो आप उसे अधिकार में लेना चाहते हैं। लेकिन हम सौंदर्य को कैसे अपने अधिकार में ले सकते हैं। जो आपसे बड़ा है, उसे आप कैसे अपना बना सकते हैं। ईश्वर सर्वाधिक सुंदर है। हम ईश्वर का सबसे सुंदर रूप स्त्री या पुरुष के रूप में कल्पित करते हैं और फिर उसकी उपासना करते हैं। उस क्षण अधिकार की भावना स्वतरू विलीन हो जाती है। ईश्वर सदा युवा है, सदा नवीन। मुझे तो ईश्वर बहुत शरारती लगते हैं, उन्हें आनंद और खेल बहुत प्रिय है! शायद इसीलिए उसने संसार में इतना खेल रचा है, चिंताएं भी उसी खेल का हिस्सा हैं। यह जो चूहा दौड़ चल रही है, वह भी एक तरह का खेल ही है। जीवन स्वयं एक उत्सव है।
सौंदर्य के प्रति समर्पण जरूरी-सौंदर्य को पहचानना, सौंदर्य से प्रेम करना और सौंदर्य के प्रति समर्पित होना, ऐसे जीवन में नीरसता कभी नहीं आती। तब आध्यात्मिक साधना भी बोझ नहीं लगती। हम अकसर सोचते हैं कि आध्यात्मिकता का अर्थ है गंभीर चेहरा, कठोर मुद्रा और जितना अधिक दिखावा उतनी अधिक आध्यात्मिक उन्नति। ऐसा नहीं है। सहजता, सत्य में बढऩा, आंतरिक सौंदर्य और आंतरिक मौन में उतरना, यही सच्ची आध्यात्मिकता है। प्रेम के उस आंतरिक स्रोत को जीवित रखने के लिए आवश्यक है कि हम अपने भीतर उतरें, कुछ अंतराल रखें। मौन में हम अत्यंत गहराई से संवाद कर सकते हैं, हृदय से संवाद कर सकते हैं। यदि हम प्रतिदिन उस मौन के क्षेत्र में नहीं उतरते, सब कुछ एक ओर रखकर दस मिनट आकाश को नहीं निहारते, तारों को नहीं नमन करते, तो हम जीवन के अपार सौंदर्य से वंचित रह जाते हैं।
अधिकार खराब चीज है- किसी वस्तु को अधिकार में लेने की कोशिश न करें, उसकी सराहना करें। आप अपने कपड़ों को स्वयं नहीं देख सकते और अपने दांतों को भी नहीं देख सकते। किसी और के सुंदर दांत आपकी आंखों के लिए सुंदर दृश्य बन जाते हैं। जो हमारे पास है, उसे हम देख ही नहीं पाते और जो हमारे पास नहीं है, वही हमें अधिक सुंदर लगता है। क्यों? क्योंकि मन में यह भ्रांति बैठी है कि जो सुंदर है, उसे अपने पास होना चाहिए। यदि आप इस भ्रम को मन से अलग कर दें कि सुंदर वस्तु का अर्थ अधिकार नहीं है, वह सुंदर है, बस उसकी उपस्थिति ही आनंद है, तो आप वास्तव में सौंदर्य का अनुभव करने लगते हैं।
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