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    Home»देश»श्रीनगर के रघुनाथ मंदिर में 36 साल बाद आस्था की घंटियां
    देश

    श्रीनगर के रघुनाथ मंदिर में 36 साल बाद आस्था की घंटियां

    adminBy adminApril 11, 2026No Comments3 Views
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    नई दिल्ली, 11 अप्रैल (दि)। ऋषि कश्यप की पावन धरा जम्मू-कश्मीर प्राचीन काल से ही भारत की सांस्कृतिक, आध्यात्मिक एवं दार्शनिक चेतना का एक महत्त्वपूर्ण केंद्र रहा है। आदि गुरु शंकराचार्य से लेकर आचार्य अभिनवगुप्त और ऐसे अनेक साधकों की ज्ञान प्राप्ति के लिए की गई तपस्या यहां फलीभूत हुई है। 1990 की आतंकवाद की त्रासदी के बाद पिछले दिनों हुई कुछ घटनाओं के माध्यम से यह पुण्य धरा पुनः धार्मिक-सांस्कृतिक पुनर्स्थापना की साक्षी बनी है। सबसे महत्त्वपूर्ण घटना श्रीनगर की है। यहां हब्बाकदल में 36 वर्षों के लंबे इंतजार के बाद भगवान श्रीराम को समर्पित रघुनाथ मंदिर के कपाट खुले। श्री राम नवमी के पावन अवसर पर यहां 36 साल बाद आस्था की घंटियां बजीं। श्रद्धालुओं ने अपने आराध्य देव की पूजा-अर्चना की। हवन और यज्ञ की सुगंध ने पूरे वातावरण को भक्तिमय बना दिया। धूप-बत्ती के साथ आरती उतारी गई। धार्मिक आयोजन होने के साथ-साथ यह एक भावनात्मक एवं सांस्कृतिक अभिव्यक्ति का भी अवसर था। चार दशक तक विस्थापन का बोझ ढोते लोगों का अपनी जड़ों की ओर एक दिन के लिए ही सही, लौटने का साहस जुटाना वाकई बड़े सुकून की बात है। 1990 का दौर कश्मीरी पंडितों के लिए कभी न भूल पाने वाले एक दुरूस्वप्न जैसा था। आतंकवाद के चरम के उस भयावह दौर में लाखों कश्मीरी पंडितों को घाटी से भागना पड़ा था। हिंसा और अशांति की उस त्रासदी में उनकी निजी संपत्ति से लेकर सामूहिक आस्था के केंद्र तक सब कुछ पीछे छूट गया। वे वहां से यदि कुछ लेकर भागे थे, तो वह थी अपनी मातृभूमि पर कभी लौट पाने की कष्टकारी नाउम्मीद।
    अब 36 वर्षों के लंबे कालखंड के बाद यदि श्रीनगर की अशांत धरती पर पुनः मंदिरों के कपाट खुले हैं, तो इसी के साथ लाखों कश्मीरी पंडितों के दिलों में उम्मीद की एक किरण ने भी एक दस्तक दी है। हब्बा कदल में स्थित ऐतिहासिक रघुनाथ मंदिर में 36 वर्षों बाद कपाट खुलना कश्मीर के लिए दृढ़ता, सांस्कृतिक पुनर्स्थापना और आशा का एक हृदयस्पर्शी प्रतीक बन गया है। इस संतोषजक बदलाव के लिए कुछ विद्वतजन जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद-370 और 35ए के भंग होने के सकारात्मक परिणाम के रूप में भी देख रहे हैं। जम्मू-कश्मीर के वरिष्ठ पत्रकार अपने एक लेख में लिखते हैं कि यह संबंध है लौटते विश्वास का। धीरे-धीरे बदलते माहौल का। यह बदलाव अचानक नहीं आया है। इसके पीछे अनुच्छेद-370 व 35ए की विदाई तथा उसके साथ कई वर्षों की कोशिश है। सुरक्षा की स्थिति में सुधार, प्रशासन के अनवरत प्रयास व अनेक संगठनों की कोशिशों से लोगों के मन में भरोसा लौटता नजर आ रहा है। यही भरोसा सबसे बड़ी बात है। इस प्रकार यह अनुच्छेद-370 के निरसन के बाद कश्मीर के बदलते परिदृश्य को दर्शाता है, जो सांस्कृतिक और धार्मिक निरंतरता को पुनः स्थापित कर रहा है। वहीं, जम्मू-कश्मीर में ऐसे ही दो सुखद दृश्य अन्य देव स्थलों से भी देखने को मिले हैं। पहला दृश्य राजोरी जिले के थन्नामंडी का है। यहां देवी ढाका मंदिर में सात दशक बाद फिर से सत्संग, जागरण और हवन हुआ। बड़ी संख्या में स्थानीय लोग जुटे। आजादी के समय थन्नामंडी से अल्पसंख्यक हिंदू पलायन कर जम्मू या राजोरी चले गए थे। तब से इस मंदिर की रौनक गायब थी। दशकों बाद यह दस्तक पुनर्जागरण का प्रतीक है। दूसरा दृश्य कुपवाड़ा के गुंड गुशी गांव का है।
    यहां चार दशक बाद कश्मीरी पंडित अपने पैतृक स्थान पर मां शारदा के मंदिर में सामूहिक पूजा-अर्चना के लिए लौटे। पारंपरिक नव वर्ष के रूप में मनाए जाने वाले नवरेह की यह सुबह इनके लिए अनेक स्मृतियों का क्षण बन गई। इस गांव में जब ‘मां शारदे की जय’ की गूंज पहाड़ों में फैली, तो उसमें खुशी के साथ एक अनकही कसक भी थी। गुंड गुशी जैसे शांत गांव में यह आयोजन बताता है कि कश्मीर की आत्मा अब भी अपनी जड़ों को पहचानती है। धार्मिक स्थलों का संरक्षण आस्था से कहीं बढक़र सांस्कृतिक विरासत की रक्षा का भी विषय है। जम्मू-कश्मीर में लंबे समय बाद मंदिरों के पुनः खुलने की ये घटनाएं आशा और पुनर्स्थापना का सकारात्मक संकेत देती हैं। हालांकि बदलाव की ये सुखद घटनाएं एक अनकहा सवाल भी छोड़ गई हैं कि क्या इन सभी मंदिरों की घंटियां नियमित रूप से गूंजेंगी? इस बदलाव को स्थायी बनाने के लिए निरंतर प्रयास आवश्यक हैं। इसके लिए सरकार और प्रशासन को सुरक्षा, पुनर्वास और आधारभूत सुविधाओं को और सुदृढ़ करना चाहिए। साथ ही स्थानीय समुदायों के बीच आपसी विश्वास, संवाद और सांस्कृतिक सह-अस्तित्व को बढ़ावा देना अत्यंत जरूरी है।

    Bells of Faith Ring at Srinagar's Raghunath Temple After 36 Years Desh New Delhi shift tazza khabar tazza khabar in hindi
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