नई दिल्ली, 14 मार्च (जा)। एनसीईआरटी की पुस्तक में ‘न्यायपालिका में भ्रष्टाचार’ पर अध्याय लिखने वाले शिक्षाविदों पर कार्रवाई से संबंधित सुप्रीम कोर्ट के 11 मार्च के आदेश को शिवसेना-यूबीटी सांसद प्रियंका चतुर्वेदी ने न्यायपालिका की अतिसक्रियता और न्यायिक तानाशाही’ करार दिया है। राज्यसभा में गत दिवस शून्यकाल के दौरान एनसीईआरटी पाठ्यपुस्तक का मामला उठाते हुए उन्होंने न्यायपालिका और न्याय प्रक्रिया के प्रति पूर्ण सम्मान व्यक्त करते हुए कहा कि शासन के तीनों अंग यानी विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका कानून के समक्ष समान, जवाबदेह और जांच के दायरे में होने चाहिए।
शिवसेना सांसद ने कहा कि मैं समझ सकती हूं कि भ्रष्टाचार पर सिर्फ न्यायपालिका को निशाना बनाए जाने से न्यायपालिका को परेशानी हुई होगी। एनसीईआरटी की संबंधित पुस्तक तक पूर्ण प्रतिबंध लगा। वहां तक सही है।
एनसीईआरटी द्वारा माफी मांगे जाने का भी उल्लेख करने के साथ ही 11 मार्च को मुख्य न्यायाधीश की अध्यक्षता वाली पीठ द्वारा दिए गए आदेश पर आपत्ति जताई। उन्होंने कहा कि इस आदेश में कहा गया है कि अध्याय लिखने वाले शिक्षाविदों को अकादमिक मामलों, सार्वजनिक वित्त पोषित संस्थानों और सरकारी संस्थानों में कोई भूमिका नहीं निभानी चाहिए।
शिवसेना सांसद ने कहा कि यह मुझे न्यायिक अतिसक्रियता और न्यायिक तानाशाही लगती है। संसद में अपना मत रखा कि शासन के हमारे तीनों अंग कानून के दायरे में समान, जवाबदेह और जांच के दायरे में आने चाहिए। कानून मंत्री से आग्रह किया कि यह सुनिश्चित कराना चाहिए कि भविष्य में न्यायिक तानाशाही न हो।
प्रियंका चतुर्वेदी ने याद दिलाया कि एक उच्च न्यायालय के न्यायाधीश के आवास से भारी मात्रा में नकदी बरामद होने के बाद उनके विरुद्ध महाभियोग का नोटिस संसद में लंबित है, लेकिन उनका मात्र तबादला कर दिया गया और कोई कार्रवाई नहीं की गई। वहीं, यदि किसी राजनेता या अधिकारी पर भ्रष्टाचार का आरोप लगता है तो कार्रवाई की जाती है और आरोपों की उचित जांच की जाती है।
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