प्रयागराज, 10 मार्च (हि)। इलाहाबाद हाइकोर्ट ने महत्वपूर्ण निर्णय देते हुए कहा कि सार्वजनिक भर्ती परीक्षाओं में प्राप्त अंक गोपनीय जानकारी नहीं माने जा सकते। इसलिए यदि परीक्षा में शामिल कोई अभ्यर्थी आरटीआई के तहत दूसरे अभ्यर्थियों के अंक मांगता है, तो इसके लिए तीसरे पक्ष की सहमति आवश्यक नहीं है। जस्टिस अजीत कुमार और जस्टिस स्वरूपमा चतुर्वेदी की खंडपीठ ने कहा कि सार्वजनिक परीक्षा में प्राप्त अंक निजी गोपनीय जानकारी की श्रेणी में नहीं आते।
खंडपीठ ने कहा कि यदि किसी अभ्यर्थी द्वारा, जिसने स्वयं भी परीक्षा में भाग लिया हो, दूसरे अभ्यर्थी के प्राप्तांक की जानकारी मांगी जाती है तो इसे ऐसी गोपनीय निजी सूचना नहीं माना जा सकता जिसके लिए तीसरे पक्ष की सहमति आवश्यक हो।” मामला रेलवे में विधि सहायक पद के लिए आयोजित परीक्षा से जुड़ा था। वर्ष 2008 में एक अभ्यर्थी ने सूचना का अधिकार कानून के तहत अपने और दो अन्य अभ्यर्थियों के अंक तथा उत्तर पुस्तिकाओं की जानकारी मांगी थी।
विभाग ने अंक उपलब्ध नहीं कराए, लेकिन आवेदक को किसी भी दिन उत्तर पुस्तिकाओं का अवलोकन करने की अनुमति दी। इस आदेश के खिलाफ केंद्रीय सूचना आयोग में अपील की गई, जहां आयोग ने आवेदक को उत्तर पुस्तिकाओं की प्रतियां देने का निर्देश दिया। इसके बाद वाराणसी स्थित डीजल लोकोमोटिव वर्क्स के महाप्रबंधक ने उत्तर पुस्तिकाओं की प्रतियां देने के निर्देश के खिलाफ पुनर्विचार याचिका दायर की, जिसे खारिज कर दिया गया। इसके बाद मामला हाइकोर्ट पहुंचा।
हाइकोर्ट ने कहा कि आरटीआई कानून के तहत ऐसी निजी जानकारी का खुलासा नहीं किया जा सकता, जो किसी सार्वजनिक गतिविधि या सार्वजनिक हित से संबंधित न हो और जिससे किसी की निजता का अनावश्यक हनन हो। हालांकि, अदालत ने स्पष्ट किया कि सार्वजनिक परीक्षा में प्राप्त अंक सार्वजनिक गतिविधि से जुड़े होते हैं और इन्हें साझा करने से किसी की निजता का उल्लंघन नहीं होता। अदालत ने यह भी कहा कि यदि किसी मामले में जांच लंबित हो तो उस अवधि तक जानकारी रोकी जा सकती है, लेकिन सामान्य परिस्थितियों में अंक बताने से इंकार नहीं किया जा सकता।
अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि किसी दूसरे अभ्यर्थी की उत्तर पुस्तिका की फोटोकॉपी मांगना अधिकार के रूप में नहीं किया जा सकता, क्योंकि उत्तर पुस्तिकाओं में परीक्षक के हस्ताक्षर या अन्य ऐसी जानकारी हो सकती है जो सार्वजनिक नहीं की जानी चाहिए। अदालत ने कहा कि ऐसे मामलों में अभ्यर्थी को उत्तर पुस्तिका का अवलोकन करने की अनुमति देना पर्याप्त माना जा सकता है। हाइकोर्ट ने कहा कि आरटीआई कानून का उद्देश्य सार्वजनिक हित से जुड़ी जानकारी उपलब्ध कराना है। इसलिए सार्वजनिक भर्ती परीक्षाओं में प्राप्त अंकों की जानकारी देना जरूरी है, लेकिन दूसरे अभ्यर्थियों की उत्तर पुस्तिकाओं की प्रतियां देना अनिवार्य नहीं है।
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