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    Home»देश»एक माह तक डीयू में सार्वजनिक सभा, जुलूस और धरना-प्रदर्शन पर पूरी तरह से रोक
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    एक माह तक डीयू में सार्वजनिक सभा, जुलूस और धरना-प्रदर्शन पर पूरी तरह से रोक

    adminBy adminFebruary 18, 2026No Comments2 Views
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    नई दिल्ली, 18 फरवरी। दिल्ली विश्वविद्यालय (डीयू) परिसर में एक महीने के लिए किसी भी तरह की सार्वजनिक सभा, जुलूस और प्रदर्शन पर पूरी तरह से रोक लगा दी गई है। इस संबंध में विश्वविद्यालय के प्रॉक्टर प्रो. मनोज कुमार ने छात्रों, फैकल्टी सदस्यों और स्टाफ को सूचित करने के लिए आदेश जारी किया है। इस आदेश को गत दिवस से ही लागू कर दिया गया है। प्रो. मनोज कुमार के अनुसार यह आदेश इस जानकारी के आधार पर जारी किया गया है कि डीयू परिसर में बिना रोक-टोक के सार्वजनिक समारोहों, जुलूस या प्रदर्शन से ट्रैफिक में रुकावट, इंसानी जान को खतरा और जनशांति भंग हो सकती है। पहले भी आयोजक अक्सर ऐसे छात्र विरोध प्रदर्शनों को नियंत्रित करने में असफल रहे हैं। जिससे विश्वविद्यालय परिसर में कानून-व्यवस्था बिगड़ रही है।
    प्रॉक्टर ने आदेश में सब डिविजन सिविल लाइंस के असिस्टेंट कमिश्नर ऑफ पुलिस के 26 दिसंबर 2025 वाले आदेश का हवाला दिया है। जिसमें गृह मंत्रालय की अधिसूचना का विवरण दिया गया है। इसमें विश्वविद्यालय परिसर में किसी भी सार्वजनिक सभा, रैली, धरने प्रदर्शन, आंदोलन और किसी भी ऐसी गतिविधि पर रोक के आदेश है जिससे आम लोगों की शांति और यातायात की आवाजाही प्रभावित हो।
    डीयू के आदेश को लेकर शिक्षकों और छात्रों ने विरोध दर्ज कराया है। डीयू कार्यकारी परिषद के सदस्य मिथुराज धुसिया ने कहा कि यह आदेश लोकतांत्रिक अधिकारों का हनन है। यह सच है कि सरकार, विश्वविद्यालय और इसके संबद्ध कॉलेजों की गलत नीतियों के खिलाफ सभी विरोध-प्रदर्शन और आंदोलन पूरी तरह शांतिपूर्ण होने चाहिए और यह सुनिश्चित करना विश्वविद्यालय का कर्तव्य है।
    हालांकि, विश्वविद्यालय में यातायात अवरोध आदि के बहाने विरोध प्रदर्शनों और आंदोलनों पर रोक लगाना बिलकुल भी स्वीकार्य नहीं है। उन्होंने कहा कि क्या विश्वविद्यालय प्रशासन विश्वविद्यालय विभागों में नियुक्तियों में बड़ी संख्या में गैर-वित्तीय मामलों या एनईपी की विफलता, यूजीसी इक्विटी बिल या विश्वविद्यालय के शिक्षकों के निलंबन के मामलों के खिलाफ सार्वजनिक सभाओं और आंदोलनों को नहीं चाहता है।
    ऑल इंडिया स्टूडेंट्स एसोसिएशन(आइसा) दिल्ली राज्य के सचिव अभिज्ञान ने कहा कि डीयू का यह आदेश काफी आश्चर्यजनक और चिंताजनक है। यह छात्रों की आवाज को दबाने का प्रयास है। परिसर में हिंसा करने वालों को भगा दिया जाता है और उन पर कार्रवाई करने की जगह प्रदर्शन और जुलूस पर रोक लगाई जाती है। छात्र मुद्दों पर चर्चा न करे उसे रोकने वाला यह कदम है।
    बता दें कि 12 फरवरी को आर्ट फैकल्टी के बाहर छात्रों के आयोजित कार्यक्रम में एक प्रोफेसर पर पानी और डस्टबिन फेंके जाने का मामला सामने आया था। फिर अगले दिन 13 फरवरी को यूजीसी इक्विटी को लेकर आर्ट फैकल्टी पर प्रदर्शन के दौरान जमकर नारेबाजी और हंगामा हुआ था। हालात मारपीट तक पहुंच गए थे। जिसके बाद छात्रों ने मौरिस नगर थाने के बहार भी विरोध दर्ज कराया था। इस मामले में पुलिस ने दोनों पक्षों की ओर से क्रॉस एफआईआर दर्ज की थी। वहीं परिसर में हुए हंगामे को लेकर डीयू कुलपति योगेश सिंह ने घटना की निंदा और चिंता व्यक्त की थी।
    विरोध प्रदर्शनों पर प्रतिबंध तानाशाही और छात्र-विरोधी: एनएसयूआई
    नेशनल स्टूडेंट्स यूनियन ऑफ इंडिया (एनएसयूआई) ने डीयू में विरोध प्रदर्शनों पर लगी रोक की कड़ी निंदा की है। साथ ही आदेश को तानाशाही और छात्र विरोधी बताया है। एनएसयूआई के राष्ट्रीय अध्यक्ष वरुण चौधरी ने कहा कि विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के विनियमों के न्यायपूर्ण क्रियान्वयन की मांग कर रहे अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और अन्य पिछड़ा वर्ग के छात्रों की आवाज दबाने का यह सुनियोजित प्रयास है।
    यह प्रतिबंध आज शैक्षणिक संस्थानों को नियंत्रित कर रही खतरनाक मानसिकता को उजागर करता है, जहां राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़े संगठनों को परिसर में कार्यक्रम आयोजित करने की खुली अनुमति मिलती है। जबकि प्रशासन के निर्णयों का विरोध करने वाले छात्र संगठनों पर प्रतिबंधात्मक और दमनकारी आदेश थोप दिए जाते हैं। उन्होंने कहा कि जब भी छात्र आरक्षण, समानता और सामाजिक न्याय के मुद्दों पर प्रशासन से सवाल करते हैं तो उन्हें भयभीत किया जाता है।
    यह छात्र शक्ति के प्रति डर और सत्ताधारी व्यवस्था की असुरक्षा को दर्शाता है। संविधान हमें शांतिपूर्ण विरोध का अधिकार प्रदान करता है। कोई भी मनमाना प्रशासनिक आदेश हमारे लोकतांत्रिक अधिकारों को समाप्त नहीं कर सकता। एनएसयूआई ने डीयू और देशभर के छात्रों के साथ एकजुटता व्यक्त करते हुए चेतावनी दी कि परिसर में लोकतांत्रिक अभिव्यक्ति को रोकने का कोई भी प्रयास छात्र प्रतिरोध को और अधिक सशक्त करेगा।
    वहीं क्रांतिकारी युवा संगठन (केवाईएस) ने डीयू के प्रॉक्टर कार्यालय द्वारा जारी आदेश की कड़े शब्दों में भर्त्सना की है। केवाईएस के अनुसार जारी आदेश में डीयू प्रशासन ने इन्हें प्रतिबंधित करने के लिए यातायात में बाधा होने जैसे बेहद अस्पष्ट और लचर बहाने बताए हैं। डीयू का यह आदेश खुले तौर पर शांतिपूर्ण विरोध और असहमति जताने के मौलिक अधिकार को दबाने की कोशिश करता है। यह पहली बार नहीं है जब डीयू ने खुलेआम ऐसा करने की कोशिश की है। डीयू प्रशासन ने कई मौकों पर सत्ताधारी पार्टी से जुड़े एक खास असामाजिक छात्र-समूह को बढ़ावा दिया है जो कैंपस में लगातार हंगामा करता है।
    डेमोक्रेटिक टीचर्स फ्रंट (डीटीएफ) ने डीयू प्रॉक्टर कार्यालय के आदेश की तीखी निंदा की है। डीटीएफ ने इसे शांति बनाए रखने के नाम पर लोकतांत्रिक अभिव्यक्ति को कुचलने वाला, दमनकारी और असंवैधानिक कदम बताया है। इस आदेश की आड़ में यूजीसी इक्विटी संबंधी प्रदर्शनों के आंदोलन को दबा नहीं सकता है। साथ ही आदेश को तत्काल वापस लेने की मांग की गई है।
    डीटीएफ के अध्यक्ष राजीब रे और सचिव आभा देव हबीब के अनुसार यह आदेश यूजीसी विनियम 2026 के पक्ष में चल रहे लोकतांत्रिक आंदोलन को दबाने के उद्देश्य से लाया गया है। यह निर्देश भारत के संविधान के अनुच्छेद 19(1)(ए) और 19(1)(बी) में निहित अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और शांतिपूर्ण सभा के अधिकार का खुला उल्लंघन है। प्रशासन द्वारा दिसंबर 2025 के एक पुलिस आदेश का हवाला देना भ्रामक और छलपूर्ण है।
    यह आदेश विश्वविद्यालय परिसर को लोकतांत्रिक संघर्ष का मंच बनने से रोकने के लिए लाया गया है। इस आदेश को तत्काल वापस लेने की मांग करते है। साथ ही देशभर के लोकतांत्रिक संगठनों से डीयू छात्रों, शिक्षकों और कर्मचारियों के साथ एकजुटता दिखाने की अपील है। संवैधानिक मूल्यों, सामाजिक न्याय और लोकतंत्र की रक्षा के लिए संघर्ष जारी रहेगा और इसे किसी भी तरह रोका नहीं जा सकता।

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