1299 ईसवी में आतंातियों से सोमनाथ मंदिर की रक्षा करते हुए अपने प्राणों का बलिदान देने वाले हमीर जी गोहिल की प्रतिमा पर पुष्पांजलि अर्पित की। ११ जनवरी २०२६ का दिन अगर ध्यान से सोचे तो धार्मिक दृष्टिकोण से इतिहास में महत्वपूर्ण बन गया क्योंकि इस दिन देश के यशस्वी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी ने गुजरात के मुख्यमंत्री भूपेंद्र सिंह पटेल के साथ विशेष रूप से तैयार एक वाहन पर खड़े होकर एक किमी लंबी शौर्यं यात्रा के दोनों और खड़े लोगों का अभिवादन किया। १०८ घोड़ों की टापों की गूंज और भगवान शंकर के सबसे प्रिय वाद्ययंत्र डमरू से निकलने वाली संगीतमय आवाज से यात्रा का माहौल अनुकरणीय हो गया था। गुजरात के गिर सोमनाथ में स्थित सोमनाथ मंदिर की रक्षा करते हुए अपने प्राणों का बलिदान देने वालों के प्रति सम्मान प्रदर्शित करने वाले इस यात्रा के दौरान पीएम मोदी ने लौहपुरूष सरदार वल्लभ भाई पटेल को भी श्रद्धांजलि दी। शंख सर्कल से हमीर जी गोहिल तक का मार्ग दर्शनीय हो गया था। यात्रा में पीएम के वाहन के साथ युवा पुजारियों ऋषि कुमार का एक समूह चल रहा था। यात्रा के बीच एक ऋषि कुमार से दो डमरू लेकर जब प्रधानमंत्री मोदी ने बजाने शुरू किए तो सब मंत्रमुग्ध हो गए और बाबा सोमनाथ की जय जयकार करने लगे। जम्मू, कश्मीर मणिपुर राजस्थान से आए कलाकारों ने अपनी शानदार कलाओं का प्रदर्शन किया तो महाराष्ट्र से आई २४ महिलाओं की टोली ने अच्छा प्रदर्शन कर सभी का मन मोहा। बताते चलें कि सोमनाथ मंदिर की रक्षा करते हुए अपने प्राणों का बलिदान देने वालों का साहस हमेशा याद रहेगा।
सोमनाथ के नाम में ही सोम अर्थात अमृत छिपा है। कुल मिलाकर यह कह सकते हैँ कि सैंकड़ो साल के इतिहास में सोमनाथ मंदिर समेत भारतीय परंपराओं के प्रतीक को नष्ट करने वाले तो अब बीते समय की बात हो गई है लेकिन हमारे धार्मिक सांस्कृतिक संस्थान आज भी शान से खड़े नजर आ रहे हैं। पीएम का यह कहना सही है कि सोमनाथ तोड़ने वाले इतिहास के पन्नों में सिमट गए। लोगों का दिल तलवार से नहीं अपने काम से जीता जा सकता है। आज दुनिया की भारत से उम्मीदें बढ़ी हैँ पीएम के इस कथन के साथ यह भी कहा जा सकता है कि देशवासियों को पीएम से बड़ी उम्मीदें हैं और सारा देश उनकी ओर आशा से निहार रहा है। सोमनाथ मंदिर निर्माण के ७५ साल पूरे होने पर हुई पीएम की यह यात्रा में जहां जनसैलाब जुड़ा वहीं सामूहिक एकता भी नजर आई। यहां गुजरात का गरबा राजस्थान का मयूर नृत्य और मणिपुर के पारंपरिक नृत्य उपस्थितों का मन मोह रहे थे और देशवासियों ने भी मीडिया के माध्यम से इस यात्रा का खूब आनंद लिया। पीएम के प्रयासों से जो यह शौर्य यात्रा निकली उसके लिए उनकी तारीफ भी की गई। हमें सृजन की जीत भी कह सकते हैं और विध्वंशकारी ताकतों को यह संदेश भी दे रहे हैं कि सनातन धर्म और उसे मानने वाले कभी भी कमजोर नहीं रहे। उनकी शांत प्रियता का लाभ उठाने की कोशिश होती रही मगर लंबे समय तक इस काम में कोई भी सफल नहीं हो पाया। आक्रमण के एक हजार साल पूरे पर शौर्य यात्रा इस बात की प्रतीक है। इस मौके पर सरदार वल्लभभाई पटेल, पूर्व राष्ट्रपति राजेंद्र प्रसाद व इसके लिए बलिदान हुए सनातनियों के बलिदान का प्रतीक भी कह सकते हैं। इसलिए सोमनाथ मंदिर हो या अन्य कोई पुरानी धरोहर उसके पुननिर्माण का विरोध तो दूर विध्वंसकारियों को अब इस बारे में सोचना भी नहीं चाहिए क्योंकि आजकल जो माहौल पीएम के प्रयासों से बना है उसमें किसी भी प्रकार की कटटरता की जगह नहीं है। सोमनाथ मंदिर और धार्मिक स्थलों के पुर्नद्धार का कार्य पूरा हो गया । आतिशबाजी और ड्रोन शो के कार्यक्रम से यह यात्रा बलिदान देने वालों की याद में स्मरणीय हो गई है। कुल मिलाकर कह सकते हैं कि विरोधी विचारधारा और आलोचना को अपनी उपलब्धि मानने वालों को छोड़ दें तो देशवासियों के लिए यह पर्व राष्ट्रीय एकता और धर्म के प्रति समर्पण देशभक्तों के लिए सहयोग और बलिदानियों का याद करने का बन गया।
(प्रस्तुतिः- रवि कुमार बिश्नोई संपादक दैनिक खुशबू टाइम्स मेरठ)
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