जिन लोगों के पास घर नहीं है और सर्दी व बारिश से बचाव के साधन उपलब्ध नहीं है ऐसे नागरिकों के लिए सर्दियों में रैन बसेरे खुल तो गए है लेकिन रोज ही इनमें खामियां मिलने और जनप्रतिनिधियों से लेकर अधिकारियों तक इस पर नाराजगी व्यक्त किए जाने से यह स्पष्ट है कि सरकारी नीति के तहत पात्रों को सुविधाएं पूरी तौर पर शायद नहीं मिल रही हैं। जनपद के प्रभारी मंत्री धर्मपाल सिंह द्वारा बीते दिनों रैन बसेरों का निरीक्षण किया गया। उन्होंने कहा कि अलाव जलाएं रैन बसेरों में लोगेां को भोजन भी दें। इससे पहले यह सुझाव भी सुनने को मिला था कि रैन बसेरों में हीटर लगाए जाएं। बढ़ते प्रदूषण को लेकर एनजीटी ने जो रोक लगाई गई है उनमें लकड़ी जलाने पर भी रोक बताई जाती है वो भी नहीं जल सकती और हीटर से होने वाली घटनाओं को देखते हुए उसका लगा पाना भी संभव नहीं है। सुझाव तो बहुत दिए जाते हैं मगर सबका पालन नहीं हो सकता। पिछले कई दशक से इन रैन बसेरों व मुख्य चौराहों पर लकड़ी जलाई जा रही है। उन्हेें रोक पाना भी संभव नहीं है। मंत्री ने भोजन की बात कही वह तो ठीक है मगर मंत्री जी आपके सुझाव को लागू कराने में आप सक्षम है लेकिन कई लोगों का मानना है कि जनहित के कामों में लापरवाही और भ्रष्टाचार उजागर हो रहा है उसके चलते हीटर जलाना या भोजन देना शायद नियमित रूप से संभव नहीं होगा इसलिए मुझे लगता है कि नगर निगम और अन्य अफसरों को यह हिदायत दें कि वो रैन बसेरों में कंबल और रजाई व अलाव के लिए लकड़ियों की व्यवस्था करा दें तो गरीब ठंड से बचेंगे और कई धार्मिक व सामाजिक संस्थाएं भी जरूरतमंदों को भोजन उपलब्ध कराने के लिए काम कर रही है इसलिए पेट तो सभी का भर जाता है। जरूरत तो ठंड से बचाने की है।
(प्रस्तुतिः- रवि कुमार बिश्नोई संपादक दैनिक केसर खुशबू टाइम्स मेरठ)
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