पहाड़ों को धरती का स्वर्ग कहा जाता है। हर वर्ष लाखों सैलानी यहां छुटिटयां मनाने और कोलाहल के जीवन से दूर रहकर शांति से समय बिताने के लिए आते हैं। एक दृष्टि से देखें तो गहन पहाड़ी क्षेत्रों के पालन पोषण का ज्यादातर यही माध्यम है मगर अभी कुछ अत्यंत ही सघन क्षेत्रों में जो स्थिति बनी हुई है वहां लोग कई कारणों से पलायन करते जा रहे हैं। जिसके चलते यहां मरने वालों की अर्थी को कंधा देने के लिए भी उपलबध्ता पूरी तौर पर अब कम पड़ने लगी है। हम बात करें पिथौरागढ़ जिला मुख्यालय से २५ किमी दूर बसे गांव तड़ी की तो यहां रहने वाली १०० वर्षीय झूपा देवी की बीते बुधवार को मौत हो गई। पार्थिव शरीर को अत्येष्टि के लिए गांव से करीब ढाई किमी दूर काली नदी के तट पर ले जाना था लेकिन अंतिम यात्रा के लिए पूरी संख्या में लोग नहीं मिल रहे थे। गांव के पूर्व प्रधान भूपेंद्र चंद्र का कहना है कि शवयात्रा में शामिल होने के लिए पांच लोग ही हो पाए वह भी उम्रदराज थे। ऐेसे में यहां के लोगों ने नेपाल की सीमा पर तैनात एसएसबी के जवानों से मदद मांगी। तो चार जवान और दो अधिकारी लकड़ी लेकर मदद के लिए पहुंचे। खबर से पता चलता है कि तब मृतका के ६५ वर्षीय पुत्र रमेश चंद ने अपनी मां का अंतिम संस्कार किया।
नेपाल सीमा से सटे गांवों में अब चंद लोग बचे हैं। वो अब सुरक्षाकर्मियों की मदद से अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति करते हैं क्योंकि नौजवान बाहर नौकरियों के लिए हल्द्वानी दिल्ली आदि शहरों को चले गए। कुल मिलाकर उना कोटा ब्लॉक के इस तड़ी गांव में २० साल पहले तक ३७ परिवार रहते थे जो अब घटकर १३ रहे गए। २४ परिवार गांव छोड़कर बनबसा, खटीमा, हल्द्वानी आदि जगहों पर जाकर बस गए। इसके साथ एक बड़ी समस्या यह भी है कि यहां रहने वालों के लिए वन्य जीवों का डर हमेशा बना रहता है और कम होती युवाओं की संख्या, कमाई के साधन ना होने और गिनती के परिवारों के चलते सड़कें पक्की ना होने के कारण जंगली सुअर खेती को नष्ट कर देते हैं। गुलदार और भालू नागरिकों को नुकसान पहुंचाते हैं।
मुझे लगता है कि उत्तराखंड के सीएम पुष्कर सिंह धामी खुद पहाड़ी क्षेत्रों के रहने वाले हैं। यूपी के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का परिवार भी इसी पहाड़ी इलाके में बसता है। इसलिए पहाड़ों के गांवों से पलायन रोकने के लिए उत्तराखंड के सीएम को यूपी के मुख्यमंत्री से विचार कर केंद्र सरकार की मदद से दूरदराज के गांवों में निवासियों और यहां से पलायन रोकने के लिए कुछ ऐसी योजनाएं बनवाएं जिससे इन गांवों के लोगों का जीवन सुरक्षित और दो समय की रोटी मिल जाए क्येंकि अगर पहाड़ों से पलायन नहीं रूका तो भविष्य में देश के सामने यह भी एक बड़ी समस्या उत्पन्न हो सकती है क्योंकि पर्यावरण संतुलन और पर्यटन के क्षेत्र में इनका बड़ा योगदान है। बस सरकार को थोड़ा ध्यान देकर इन्हेें जानवरों से बचाने तथा रोटी की उपलब्धता के साथ साथ पारिवारिक उत्सव और अन्य काम पूरे होते रहें तो मुझे लगता है कि शायद कोई भी अपनी जन्म और कर्मभूमि छोड़कर जाना नहीं चाहेगा। क्योंकि इनमें उत्पन्न जड़ी बूटियां और फलों और फूलों की खेती को बढ़ावा देने के लिए बाजार उपलब्ध कराए जाते ही यहां खुशहाली और ग्रामीणों की संख्या में बढ़ोत्तरी होते देर नहीं लगेगी।
(प्रस्तुतिः- रवि कुमार बिश्नोई संपादक दैनिक केसर खुशबू टाइम्स मेरठ)
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