पैकेटबंद खाने में कितनी चीनी और अन्य चीज मिलाई गई है इस बारे में पैकेट पर साफ लिखा होना चाहिए। बताते चलेें कि खाद्य एवं वितरण संबंधी समिति ने संसद में अपनी रिपोर्ट पेश की। समिति का कहना है कि नियम का मसौदा सितंबर २०२२ में ही तैयार हो गया था। इसके लिए १४ हजार से अधिक लोगों व कंपनियों की राय मिली। यह मामला सिर्फ समीक्षा में ही अटका रहा। लेकिन अब इसे सख्ती से लागू किया जाएगा। खबर के अनुसार खाद्य नियामक एफएसएसएआई को पैकेट में खाने संबंधी नियमों को तय समय में लागू करने के निर्देश दिए गए हैं। आरडब्लयूएचओ के अनुसार ६ साल के बच्चे के पूरक आहार में चीनी नहीं मिलाई जानी चाहिए। अमेरिका में दो साल के बच्चे के खाने में चीनी मिलाने की अनुमति नहीं है। भारत में नियमों के अनुसार शिशु आहार में सुकोज या फ्रक्टोज तभी मिलाया जा सकता है जब वह काबोहाइड्रेट स्रोत के रुप में आवश्यक हो। स्मरण हो कि ऐसे नियम पहले से लागू हैं लेकिन उनका पालन पूरी तौर पर नहीं हो पाता। अब नियमजल्द लागू करने के निर्देश दिए जाएंगे। दूसरी तरफ एक खबर के अनुसार औषधि निरीक्षकों की कमी से नकली दवाओं का कारोबार बढ़ रहा है क्योंकि एक निरीक्षक के भरोसे दो तीन जिलों का काम है। औषधि निरीक्षकों की कमी तो सरकार को देखनी है लेकिन बच्चों के पौष्टिक भोजन में चीनी का प्रयोग और नकली दवाओं के काम को रोकने वाले खाद्य विभाग के अधिकारी अपना काम जिम्मेदारी से करें तो संख्या कम होने के बाद भी पौष्टिक आहार के नियम लागू हो सकते हैं और नकली दवाओं की बिक्री खत्म हो सकती है। सरकार इस बारे में काफी सोच रही है लेकिन देश में शादी या अन्य आयोजनों में प्रमुख अफसर और जनप्रतिनिधि जाते हैं उसमें दही रायता और पकौड़ी में चीनी मिलाकर उसे मीठा बनाया जाता है जिसे शुगर के मरीजों केलिए जहर ही कह सकते हैँ क्योंकि इससे शुगर बढ़ने की संभावना बनी रहती है। मेरा मानना है कि नियम लागू कराने के बाद भी खाद्य सुरक्षा विभाग के अफसरों की जवाबदेही तय की जाए कि वो शादियों में जाकर खाने को देखें और दही से बने सामान में कितना मीठा बनाया जा रहा है। हलवाईयों की दुकान का आकस्मिक निरीक्षण किया जाए जिससे नागरिक बीमारियों से बचे रहेंगे। क्योंकि अब दही को मीठा बनाने के लिए चीनी का अन्य मीठा पदार्थ मिलाए जाते हैं तो नागरिकों के स्वास्थ्य से खिलवाड़ हैं।
(प्रस्तुतिः- रवि कुमार बिश्नोई संपादक दैनिक केसर खुशबू टाइम्स मेरठ)
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