नई दिल्ली, 13 जुलाई (ता)। संसद के मॉनसून सत्र की शुरुआत से एक दिन पहले 19 जुलाई को सरकार ने सर्वदलीय बैठक बुलाई है। अधिकारियों के मुताबिक यह बैठक सुबह 11 बजे शुरू होगी। संसद के प्रत्येक सत्र से पहले आयोजित होने वाली इस बैठक में सरकार अपने विधायी एजेंडे की जानकारी देगी, जबकि विपक्षी दल उन मुद्दों को सामने रखेंगे जिन्हें वे सत्र के दौरान उठाना चाहते हैं।
अधिकारियों का कहना है कि सरकार का विधायी एजेंडा इस बार काफी व्यापक है और सत्र के दौरान कई महत्वपूर्ण विधेयकों पर चर्चा होने की संभावना है। वहीं, हाल के हफ्तों में कुछ विपक्षी दलों में सामने आए मतभेद और विभाजन के कारण सत्र के हंगामेदार रहने के भी आसार हैं।
विधानसभा चुनावों में हार के बाद तृणमूल कांग्रेस में उथल-पुथल देखने को मिली है। पार्टी के 20 सांसदों ने ष्नेशनल सिटिजन्स पार्टी ऑफ इंडियाष् में विलय कर लिया है। इन सांसदों ने लोकसभा में अलग बैठने की व्यवस्था की मांग भी की है। इसके अलावा, पार्टी के तीन सांसदों ने राज्यसभा की सदस्यता से इस्तीफा देकर भाजपा का दामन थाम लिया है।
शिवसेना (यूबीटी) में भी विभाजन हुआ है। लोकसभा में पार्टी के छह सांसद महाराष्ट्र के उपमुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे के नेतृत्व वाली शिवसेना में शामिल हो गए हैं। वहीं, राज्यसभा में आम आदमी पार्टी के सात सांसद पहले ही भाजपा में शामिल हो चुके हैं।
मॉनसून सत्र के दौरान विपक्ष की ओर से NEET-UG पेपर लीक का मामला और ऑपरेशन सिंदूर में हुई हताहतों को लेकर रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह की टिप्पणियों का मुद्दा उठाए जाने की संभावना है। कांग्रेस ने इस संबंध में रक्षा मंत्री के खिलाफ विशेषाधिकार हनन का नोटिस भी दिया है।
केंद्रीय संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू पहले ही घोषणा कर चुके हैं कि संसद का मॉनसून सत्र 20 जुलाई से 13 अगस्त तक चलेगा। उन्होंने सोशल मीडिया मंच एक्स पर कहा था कि भारत सरकार की सिफारिश पर राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने संसद के दोनों सदनों का मॉनसून सत्र 20 जुलाई 2026 से 13 अगस्त 2026 तक बुलाने को मंजूरी दी है। उन्होंने कहा था कि इस दौरान राष्ट्रीय महत्व के मुद्दों पर सार्थक बहस, चर्चा और निर्णय लिए जाएंगे।
उधर, प्रस्तावित 130वें संविधान संशोधन विधेयक की जांच कर रही संयुक्त संसदीय समिति (जेपीसी) के 17 जुलाई को अपनी रिपोर्ट अपनाने की उम्मीद है। इसके बाद समिति संसद में अपनी रिपोर्ट पेश करेगी। विधेयक के एक प्रावधान को लेकर राजनीतिक बहस तेज हो गई है। प्रस्तावित प्रावधान के अनुसार, यदि प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री या केंद्र अथवा राज्य सरकार के कोई मंत्री गंभीर अपराध के मामले में लगातार 30 दिनों तक न्यायिक हिरासत में रहते हैं, तो उन्हें अपने पद से स्वतः हटाया जाएगा।
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