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    Home»देश»पंचायत राज व महिला बाल विकास मंत्रालय महिलाओं के नहीं पुरुष सरपंचों की सुरक्षा के लिए मातृशक्ति को जिम्मेदारी दे! क्योंकि अब समय आ गया है हर क्षेत्र में इनके मान सम्मान को ध्यान में रखा जाए
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    पंचायत राज व महिला बाल विकास मंत्रालय महिलाओं के नहीं पुरुष सरपंचों की सुरक्षा के लिए मातृशक्ति को जिम्मेदारी दे! क्योंकि अब समय आ गया है हर क्षेत्र में इनके मान सम्मान को ध्यान में रखा जाए

    adminBy adminJune 22, 2026No Comments3 Views
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    महिला एवं बाल विकास मंत्रालय के सहयोग से पंचायती राज मंत्रालय द्वारा देशभर में १७.०५ लाख पुरुष सरपंचों को महिला सुरक्षा की ट्रेनिग दी जाएगी तथा निर्भया फंड से संचालित इस योजना का नाम निर्भया चेतना होगा। जिसके लिए २८.५०० मास्टर ट्रेनर तैयार किए जा रहे हैं। उक्त खबर से पता चलता है कि पुरुष प्रधान व्यवस्था में महिला सुरक्षा के नाम पर उसे और ताकतवर बनाने की कोशिश कही जा सकती है। मुझे लगता है कि यह योजना जिन मंत्रालयों के लोगों द्वारा तैयार की गई है। वरना इस योजना का नाम महिला स्वावलंबन और आत्मसम्मान और अपनी सुरक्षा हो सके। इसके लिए देशभर में महिला सुरक्षा के लिए प्रयासरत महिलाओं को यह जिम्मेदारी दी जानी चाहिए थी।
    आज जब हम हर क्षेत्र में महिलाओं को आगे लाकर अलग पहचान देने का प्रयास कर रहे हैं और महिलाएं इस मामले में पीछे भी नहीं है। ८० वर्षीय दादी निशानेबाजी में पुरस्कार जीत रही है। राजनीति में ३० से ४० प्रतिशत हिस्सेदारी देने की बात चल रही है। सीमा और देश की आंतरिक्ष सुरक्षा में लगी महिलाएं ऐसा कोई क्षेत्र नहीं है जहां अपनी उपलब्धियों का ध्वज ना फहरा रही हो। इसके उदाहरण के रुप में हम राष्ट्रपति को देख सकते हैं। किस तरह वह सफलता से हर क्षेत्र में अच्छे कार्य को बढ़ावा देने के साथ देशहित में निर्णय ले रही है। सब जगह महिलाएं आगे बढ़कर काम कर रही है और कई जगह तो पुरुष सुरक्षा के मामले में इनके द्वारा कार्य किए गए हैं। मेरा मानना है कि अभी योजना तैयार ह़ुई है। इस येाजना को महिला सुरक्षा के नाम से ही जारी रखा जाए लेकिन देशभर की पंचायतों के महिला सरपंचों की सुरक्षा की जिम्मेदारी नारी शक्ति को आगे लाने के लिए सरपंच सुरक्षा की ट्रेनिग इन्हें दी जाए क्योंकि यह कोमल और कठोर मन से सोच के तहत कार्य करती हैं। अब जूडो कराटे से आतंकियों का मुकाबला करने में ही नहीं दुनियाभर में खेलों में भी देश का नाम रोशन करने में महिलाएं महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही है। इसलिए ऐसी योजनाएं मुझे लगता है कि महिलाओं का मानसिक रुप से कमजोर करेंगी जो देश और समाज के हित में नहीं है। जिस प्रकार निर्भया कांड के बाद भी अनेक किस्से सुनने को मिले हैं उन्हें देखकर कहा जा सकता है कि हर योजना महिलाओं को सुरक्षा की जिम्मेदारी देने के साथ शुरु होनी चाहिए। पुरुषों के वर्चस्व वाली योजनाओं को सही नहीं कह सकते।
    एक खबर के अनुसार कल्पना कीजिए एक ऐसे गांव की जहां पंचायत का सरपंच महिला सुरक्षा को अपनी व्यक्तिगत जिम्मेदारी मानता हो। जहां वार्ड का पंच किसी पीड़ित महिला को न केवल थाने तक पहुंचाने में सहयोग करे, बल्कि मुआवजे और कानूनी सहायता की पूरी प्रक्रिया में उसका साथ दे।
    जहां ग्राम सभा में महिलाओं की बात सुनी जाए, उनके निर्णयों का सम्मान हो और उनकी सुरक्षा को विकास की पहली शर्त माना जाए। ये महज कल्पना नहीं बल्कि पंचायती राज मंत्रालय की सुनिश्चित और सुविचारित पहल है जिसका नाम है निर्भय चेतना।
    सरकार का मानना है कि जब प्रधान की सोच बदलती है तो गांव की तस्वीर बदलती है और इसे साकार करने के लिए सरकार ने तय किया है कि देश भर में पंचायतों के 17.5 लाख से अधिक पुरुष निर्वाचित प्रतिनिधियों को महिलाओं से जुड़े मुद्दों, लैंगिक समानता संवैधानिक मूल्यों, महिला अधिकारों और उनकी सुरक्षा व गरिमा के प्रति उत्तरदायित्व संबंधी विषयों पर प्रशिक्षित किया जाएगा।
    इस विशाल कार्यक्रम के प्रभावी क्रियान्वयन के लिए राज्य, जिला एवं ब्लाक स्तर पर 28500 मास्टर ट्रेनर्स तैयार होंगे जो निर्वाचित पुरुष प्रतिनिधियों तक पहुंच कर उन्हें प्रशिक्षित करेंगे। यह कार्यक्रम महिला बाल विकास मंत्रालय के सहयोग से निर्भया फंड से संचालित होगा। निर्भय रहो पहल का उद्देश्य उन पुरुषों को बदलना है जिनकी बात गांव सुनता है। एनसीआरबी के आंकड़े बताते हैं कि वर्ष 2024 में देश भर में महिलाओं के विरुद्ध 4.4 लाख से अधिक अपराध दर्ज हुए, अर्थात हर घंटे में करीब 50 महिलाएं किसी न किसी अपराध की शिकार हुईं। इनमें 42 प्रतिशत से अधिक केस घरेलू क्रूरता के थे। महिला सुरक्षा को लेकर पंचायती राज मंत्रालय ने इस बार नयी पहल की है, कि अगर हिंसा का स्रोत पुरुष की सोच में है तो समाधान भी वहीं से शुरू होना चाहिए। ये एक ऐसा कार्यक्रम है जो अपराध के बाद न्याय नहीं, अपराध से पहले रोकथाम की बात करता है।
    ट्रांसफॉर्म रूरल इंडिया द्वारा विकसित निर्भय चेतना प्रशिक्षण माड्यूल, समावेशी विकास के लिए पंचायतों में पुरुषत्व की नई परिभाषा देता है जिसमें समूह चर्चा और अनुभव आधारित शिक्षण के माध्यम से प्रतिभागियों का स्वयं से आमना सामना कराया जाता है। यह प्रशिक्षण एक दर्पण की तरह काम करता है जिसमें यह नहीं बताया जाता कि आप गलत हैं, बल्कि यह पूछता है कि क्या आप बेहतर हो सकते हैं।
    निर्भय चेतना अभियान
    निर्भय चेतना अभियान शुरू हो चुका है और पिछले सप्ताह 17 से 19 जून तक भारतीय लोक प्रशासन संस्थान में तीन दिवसीय मास्टर ट्रेनर्स प्रशिक्षण कार्यक्रम चला जिसमें असम, छत्तीसगढ़, हिमाचल प्रदेश, महाराष्ट्र, ओडीशा और उत्तराखंड से 40 मास्टर ट्रेनर्स सम्मिलित हुए।
    यह पहला बैच था एक ऐसे कैस्टेडिंग प्रशिक्षण माडल का जिसमें आने वाले समय में देश के सभी राज्यों और केंन्द्र शासित प्रदेशों में 28500 मास्टर ट्रेनरों के माध्यम से 17.5 लाख पुरुष प्रतिनिधियों तक पहुंचा जाएगा। निर्भय चेतना के साथ निर्भय नेत्री के अंतरगत देश भर की 14.5 लाख महिला निर्वाचित प्रतिनिधियों को कानूनी साक्षरता और क्षमता निर्माण संबंधी प्रशिक्षण दिया जाएगा जिससे वे स्थानीय प्रशासन में अधिक प्रभावी भूमिका निभा सकें। निर्भय दृष्टि के माध्यम से पंचायत स्तर पर सुरक्षा तंत्र को सुदृढ़ करने के लिए सीसीटीवी जैसी व्यवस्थाओं को बढ़ावा दिया जाएगा।
    जहां तक गांवों के सुधार और नई योजनाएं चलाने की बात है तो महिलाएं इस काम में पुरुषों से पीछे नहीं है। मुझे लगता है कि जो यह योजना बनाई गई है उसे समाप्त कर सोशल मीडिया के माध्यम से महिला सुरक्षा के कार्यक्रम चलाएं जाएं और महिलाओं के साहस की घटनाओं से अवगत कराया जाए। पिछले ४२ सालों से सोशल आर्गनाइजेशन की कॉर्डिनेटर जाहनवी तिवारी का कहना है कि उनका संगठन ४२ सालों से पश्चिमी उप्र उत्तराखंड में महिला सशक्तिकरण व किशोरियों की सुरक्षा सामुदायिक विकास वंचित एवं गरीब समुदायों के उत्थान के लिए कार्य कर रही है। जाहन्वी तिवारी का यह कथन सही है कि सोशल मीडिया सहित अन्यों की महत्वपूर्ण भूमिका है। मुझे लगता है कि सरकार को ऐसे अभियान चलाने वाली महिलाओं को इस योजना से जोड़ा जाए और जो पैसा महिला सुरक्षा के लिए पुरुष सरपंचों को तैयार करने पर लगाया जा रहा है उसे महिला सरपंचों को स्वावलंबी बनाने पर लगाया जाए तो इस अभियान को ज्यादा सफलता मिलेगी। मेरा मानना है कि वर्तमान में महिलाओं को ही ज्यादा जिम्मेदारी दी जानी चाहिए जिससे वह देश के विकास के लिए कार्य कर सके। किसी को इन्हें कमजोर नहीं समझना चाहिए। झांसी की रानी, अहिल्याबाई जैसी वीरांगनाओं के किस्से हमें बताते हैं कि महिलाएं कमजोर नहीं है। हम हमेशा से देवियों के रुप में इनकी पूजा करते चले आ रहे हैं। मेरा तो हमेशा मानना रहा कि किसी मैनेजमेंट स्कूल में दी जानी वाली शिक्षा से बेहतर गृहिणी घर के कार्यों का मैनेजमेंट अच्छी तरह से करती है।
    (प्रस्तुतिः- रवि कुमार बिश्नोई संपादक दैनिक केसर खुशबू टाइम्स मेरठ)

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