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    Home»देश»फादर्स डे मनाने से कुछ नहीं होता बच्चों में अपने मां बाप के प्रति प्रेम और सम्मान ही सुखी परिवार का आधार है
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    फादर्स डे मनाने से कुछ नहीं होता बच्चों में अपने मां बाप के प्रति प्रेम और सम्मान ही सुखी परिवार का आधार है

    adminBy adminJune 20, 2026No Comments9 Views
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    वैज्ञानिक लंबे समय से चिंपैजी, गौरिल्ला और वूटान और जैसे महावानरों का अध्ययन कर रहे हैं। मनुष्य की बुद्धि और उसके विकास क्रम को समझाने के लिए अगर ध्यान से देखें तो इन प्रजातियों में से आम आदमी लंगूर और बंदर के बारे में ही ज्यादा जानता है। लेकिन यह सभी को पता है कि मनुष्य पूर्व में बंदर थे। और उन्हीं में सुधार होते होते वह मनुष्य के रुप में विकास और जनहित के कार्यों को अंजाम देने के लिए शान शौकत से रहने की व्यवस्था के साथ आगे बढ़ रहे हैं। वैसे भी देखें तो भगवान राम के वन गमन के दौरान बंदर जाति के श्रेष्ठ हनुमान जी महाराज और अन्य द्वारा जिस प्रकार से सहयोग करते हुए युद्ध लड़ा गया वो उनकी श्रेष्ठता और बुद्धिमानी तो उसी समय तय कर चुका था। वर्तमान में मनुष्य की बुद्धि और विकास को समझने के लिए जो यह अध्ययन चल रहे हैँ उनके परिणाम तो बाद में आएंगे लेकिन यह पक्का है कि यह इंसानों के वंशज हैं और उसी तरह की बुद्धिमत्ता दिखाई दे रही है।
    मगर मुझे लगता है कि महावानरों पर नई खोज के साथ ही मनुष्य की जो समय समय पर सोच बदल रही है उस पर अध्ययन किए जाएं तो वो बहुत आवश्यक हैं। क्योंकि भगवान राम अपने पिता के आदेश पर १४ वर्ष के लिए वनवास चले गए। पितृभक्ति के अनेको उदाहरण हमारे शास्त्रों में मिलते हैं। श्रवण कुमार अपने पिता को कंधो पर बैठाकर यात्रा कराता है। वर्तमान में पिछले दिनों हरियाणा की एक बहु अपनी सास को छबड़े में बैठाकर धार्मिक यात्रा कराती है। तो कितने ही किस्से और समाचार वर्तमान में पढ़ने सुनने को मिलते हैं। इनमें अपनों की आत्मीयता भूल विभिन्न कारणों से छोटे मुददों को लेकर उनकी हत्याएं की और कराई जा रही हैं। अगर इस बारे में चर्चा की जाए तो एक लंबा इतिहास जानकारियों का रचा जा सकता है। लेकिन फिलहाल हम बात हर वर्ष मनाए जाने वाले फादर्स डे की करें तो सोनर स्मार्ट ने अपने पिता के सम्मान में १९ जून २०१४ को वाशिंगटन में पहली बार फादर्स डे मनाना शुरु किया। उनके पिता विलियम जैक्सन अमेरिका के गृहयुद्ध के एक जवान योद्धा थे। तब से हम निरंतर जून माह में तीसरा रविवार पिता के सम्मान प्रेम और योगदान को समर्पित किया गया। इस वर्ष फादर्स डे २१ जून को मनाया जा रहा है। यह दिन हमारे स्वास्थ्य और देश के यशस्वी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी द्वारा आम आदमी के हित को ध्यान में रखते हुए विश्व योग दिवस मनाया जा रहा है। वैसे तो पिता पुत्र का प्रेम के किससे अमर हैं। १९६६ को आधिकारिक रुप में अमेरिका के राष्ट्रपति लिडमन वी जॉनसन ने १९७२ में रिचर्ड निक्सन ने फादर्स डे पर अवकाश घोषित किया। कहा जाता है कि मां अगर बच्चे की परवरिश में प्रथम भूमिका निभाती है तो पिता अंगुली पकड़कर उसे समाज में आगे बढ़ने सम्मान से जीने और सम्पन्नता प्राप्त कर परिवार और अपनों के हित की सोचने का पाठ पढ़ाता है। फिलहाल यह दिन भी अन्य दिवसों की भांति व्यापार के दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण होता जा रहा है क्योंकि हर कोई अपने पिता को ग्रीटिंग कार्ड या उपहार देकर प्रेम और सम्मान की इतिश्रि करने की कोशिश कर रहा है। जबकि सही मायनों में यह दिन भावनाओं की डोर को और मजबूत करने और परिवार के प्रति प्यार को मजबूती से आगे बढ़ाने का है लेकिन जैसे हम महावानारों पर खोज कर रहे हैं हमें मानव सोच पर भी काम करना चाहिए। क्योंकि अब जहां तक देखने को आ रहा है भगवान राम और श्रवण कुमार जैसी सोच आसानी से देखने सुनने को नहीं मिलती है। क्योंकि ग्रामीण कहावत जिस प्रकार हाथ की पांचों अंगुली समान नहीं होती उसी तरह सबकी सोच एक जैसी नहीं होती लेकिन ज्यादातर पुत्र हो या पुत्री उनकी सोच बुढ़ापे में पिता को आराम देने और संम्मान से रहे इसके लिए अपनापन और सुविधा देने की बजाय ऐसे समय में जब उसे अपनों और सुविधाओं के लिए व्यवस्थाओं की जरुरत होती है ज्यादातर बच्चे उसकी संपत्ति को हड़पने के लिए उस पर कब्जा करने में ज्यादा लगे रहते हैं। कई मामलों में ऐसा देखा गया है कि एक आदमी के यहां नौजवान नौकरी के लिए आया जिसे उसने रख लिया। जब उसने काम पूछा तो बोला कि टिफिन लेकर गुरुद्वारे जाना और खुद आकर मेरे लिए लेकर आना। वेतन पहुंचा तो कहा कि रोटी मुफ्त मिलेगी यह क्या कम है। ऐसे ही बच्चे बात को मीठी करेंगे लेकिन कोशिश रहेंगी कि बाप मरने तक कमाकर खिलाता रहे और कृत्रिम प्यार दिखाते रहते हैं। यह हाल बेटे बेटियों के बारे में आए दिन सुनने को मिलता है। मगर सब लोग एक जैसे नहीं होते क्योंकि पिछले दिनों एक बेटे ने अपने पिता को लीवर देकर उसकी जान बचाई तो दो बेटियों ने अपने अंग दान कर बीमार पिता को स्वस्थ बनाया। सबकी सोच अलग है लेकिन अच्छे सोच के लिए मानव सोच के बारे में खोज करने की आवश्यकता महसूस की जा रही है जिससे सकारात्मक सोच पिता और परिवार के लिए रखने वाले बच्चों को सामाजिक रुप से या शिक्षा से उन्हें माता पिता और परिवार के प्रति जिम्मेदार बनाया जाए। पिछले दिनों एक बड़े पद पर नौकरी करने वाले बेटा बहू ने दस साल तक वृद्ध मां को पिता के ना रहने पर उनका ख्याल करने की आवश्यकता नहीं समझी लेकिन जब मां घरेलू उद्योग चलाकर साधन संपन्न हो गई और समाज में सम्मान मिलने लगा तो बेटे ने प्यार दिखाकर उसे अपने पास बुला लिया अैर घर पर छोड़ हिल स्टेशन घूमने चले गए। ऐसी अनेकों घटनाएं खोजने पर पढ़ने सुनने को मिल जाएंगी। कहने का आश्य है कि परिवार का माहौल खुशहाल बना रहे इसके लिए मां बाप को बच्चों को कामयाब बनाने के प्रयास के साथ यह भी बताते रहना चाहिए कि बड़े हो गए हो और अपना खर्च खुद चलाओ। हम पर जो है उस पर निगाह रखने या हमसे काम कराने की बात भूल जाओ। सेवा करने पर ही मेवा मिलेगी। मुझे लगता है कि फादर्स डे का सही मकसद तभी पूरा होता है। कुछ रुपये का ग्रीटिंग कार्ड या कपड़े देने से कुछ होने वाला नहीं है।
    (प्रस्तुतिः- रवि कुमार बिश्नोई संपादक दैनिक केसर खुशबू टाइम्स मेरठ)

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