आजादी के बाद से देश में आरक्षण को लेकर अनेक प्रकार के विवाद उत्पन्न होते रहे हैं। कई बार यह अदालतों में चले तो कुछ मौकों पर इसके बारे में आंदोलन धरना प्रदर्शन हुए लेकिन सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस बी.वी. नागरत्ना और उज्जवल भुइयां की पीठ ने एक याचिका पर सुनवाई करते हुए कहा कि मां बाप आईएएस हैं तो कोटा क्यों इनके बच्चों को आरक्षण की जरुरत नहीं है। सुप्रीम कोर्ट ने क्रीमीलेयर के एक स्टूडेंट के आरक्षण लेने पर चिंता जताई और कहा कि इस श्रेणी को आरक्षण से बाहर कर देना चाहिए।
सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी
अगर छात्रों के माता-पिता अच्छी नौकरियों में हैं और आय भी अच्छी है, तो बच्चों को आरक्षण से बाहर हो जाना चाहिए । सरकार द्वारा जारी कई आदेशों में पहले से ही ऐसे समृद्ध वर्गों को आरक्षण के लाभ से बाहर रखने का प्रविधान है। लेकिन अब उन आदेशों को चुनौती दी जा रही है। आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों और वंचित समूहों के मामले में, सामाजिक पिछड़ापन नहीं पिछड़ापन होता है। सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़े लोगों को आरक्षण मिलना चाहिए, यह बात सही है। लेकिन, जब माता-पिता आरक्षण का लाभ उठाकर निश्चित स्तर तक पहुंच चुके हैं, तो फिर उनके बच्चों को आरक्षण क्यों मिलना चाहिए?
कोर्ट का यह कहना बिल्कुल सही लगता है कि आर्थिक और शैक्षिक रूप से उन्नत परिवारों को आरक्षण से बाहर आना चाहिए क्योंकि संपन्न परिवारों के बच्चे आरक्षण लेते रहेंगे तो इससे कभी निकल नहीं पाएंगे। ईडब्लूएस में सामाजिक पिछड़ापन नहीं केवल आर्थिक रुप से कमजोर को आरक्षण मिलना चाहिए। बताते चलें कि इंदिरा साहनी फैसले में क्रीमीलेयर का सिद्धांत लागू हुआ था जिसकी आठ लाख रुपये सीमा बताई जाती है जबकि विद्वानों का मानना है कि आय निर्धारण मापदंड नहीं है। वेतन भत्ते पर विचार नहीं किया जाना चाहिए जो भी हो वैसे यह मुददा बहुत बड़ी चर्चा का है और सामाजिक रूप से विचार और सहमति का आधार बनने पर भी आसानी से सुलझ सकता है लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने जो निर्णय दिया उसे आधार मानकर अब संपन्न परिवार जो आरक्षण का लाभ ले रहे हैँ उन्हें उससे निकलकर गरीब व जरुरतमंदों को इसका लाभ दिलाने का प्रयास करना चाहिए क्योकि मुझे लगता है कि डॉक्टर बाबा साहब अंबेडकर ने जो न्यायिक व्यवस्था बनाई गई होगी उसमें गरीबों व जरुरतमंदों के लिए ऐसी कोई व्यवस्था तय की होगी लेकिन इसे राजनीतिक लाभ के लिए इस्तेमाल किए जाने और बड़ों लोगों का प्रयास जो भी हो जिस श्रेणी के लिए आरक्षण की बात की जाती है उसमें बड़ी संख्या में ऐसे पात्र हैं जो मिलने वाले लाभ से वंचित नजर आते हैं। जब बनारसी दास गुप्ता यूपी के सीएम थे तो उनके द्वारा टिप्पणी की गई थी कि आरक्षण जरुरतमंदों को मिलना चाहिए ना कि बड़े लोगों को। लेकिन इस बारे में कोई फैसला आज तक पूरी तौर पर नहीं हो पाया और जिन लोगों को इसमें काम करना चाहिए वो खुद इसमें फंसे रहते हैं। वैसे तो यह मुददा विद्वानों के विचारने का है लेकिन मैंने जो जरुरतमंदों व गरीबो के सामने आने वाली समस्याओं को सहा है उसके आधार पर कह सकता हूं कि सुप्रीम कोर्ट की यह टिप्पणी भविष्य में चलकर गरीब और जरुरतमंदों की समस्याओं के समाधान का कारण बनेगी क्योंकि जिस प्रकार से जागरुकता बढ़ी है तो देर सवेर सुनवाई होनी ही है। इसलिए कोई निर्णय उच्च स्तर से हो उससे अच्छा है कि समाज के लोग खुद इस बात का फैसला कर ले तो वो ज्यादा सम्मानजनक होगा। फिलहाल यही कहा जा सकता है कि संपन्न परिवारों के बच्चों को आरक्षण पर रोक के मददेनजर सुप्रीम कोर्ट का कथन मील का पत्थर साबित होगा।
(प्रस्तुतिः- रवि कुमार बिश्नोई संपादक दैनिक केसर खुशबू टाइम्स मेरठ)
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