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    Home»देश»94 साल के याची पहुंचे सुप्रीम कोर्ट सबरीमाला में महिलाओं को प्रवेश के लिए
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    94 साल के याची पहुंचे सुप्रीम कोर्ट सबरीमाला में महिलाओं को प्रवेश के लिए

    websitemarketing2019@gmail.comBy websitemarketing2019@gmail.comMay 11, 2026No Comments4 Views
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    नई दिल्ली, 11 मई (ता)। केरल के 94 वर्षीय ब्राह्मण स्कॉलर और लेखक ने सुप्रीम कोर्ट में अर्जी दाखिल कर सबरीमाला मामले में चल रही सुनवाई में दखल देने की मांग की। उन्होंने तर्क दिया कि जो रीति-रिवाज संवैधानिक सिद्धांतों के विपरीत हैं, उन्हें रद्द कर दिया जाना चाहिए। केरल के नंबूदिरी ब्राह्मण समुदाय से ताल्लुक रखने वाले स्वतंत्रता सेनानी, यात्री और लेखक एस. परमेश्वरन नंबूदिरी ने सबरीमाला मंदिर में प्रवेश को लेकर चल रहे विवाद से जुड़ी सुनवाई में दखल देने के लिए यह अर्जी दाखिल की। उन्होंने तर्क दिया कि संविधान के अनुच्छेद 25 और 26 में ऐसा कुछ भी नहीं है, जो किसी भी उम्र की महिलाओं के सबरीमाला मंदिर में प्रवेश पर रोक को सही ठहराता हो।
    धर्म, रीति-रिवाज, प्रथाएं और आध्यात्मिकता संवैधानिक वैधता की कसौटी से मुक्त नहीं हैं। यदि कोई रीति-रिवाज या धार्मिक प्रथा संवैधानिक या वैधानिक प्रावधानों का उल्लंघन करती है तो उसकी जांच की जानी चाहिए और संविधान के प्रावधानों के साथ उसकी असंगति या अवैधता की सीमा तक उसे रद्द कर दिया जाना चाहिए।ष् आवेदक ने बताया कि उन्होंने पारंपरिक तरीके से संस्कृत और आयुर्वेद का अध्ययन किया और 15 से अधिक किताबें लिखी हैं। इनमें मंदिरों पर लिखी एक किताब ष्महा क्षेत्रंगलिलूडेष् (महान मंदिरों के माध्यम से) भी शामिल है, जिसमें एक अध्याय सबरीमाला मंदिर के बारे में है। दखल देने वाले आवेदक ने कहा कि संवैधानिक नैतिकता, जो मौलिक अधिकारों और नीति निर्देशक सिद्धांतों पर आधारित है, उसे भेदभावपूर्ण रीति-रिवाजों और प्रथाओं पर वरीयता मिलनी चाहिए। उनके अनुसार, यदि सदियों से चली आ रही प्रथाएं तार्किक, अनुचित या अन्यायपूर्ण पाई जाती हैं तो उन्हें अवैध घोषित कर दिया जाना चाहिए।
    नंबूदिरी ने कहा कि मासिक धर्म के आधार पर महिलाओं के साथ किया जाने वाला भेदभाव संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत मिलने वाले गरिमा के अधिकार का उल्लंघन है। उन्होंने तर्क दिया कि मासिक धर्म के दौरान महिलाओं को अपवित्र मानने के पीछे कोई तर्क या कारण नहीं है। ऐसी प्रथाएं लैंगिक समानता को कमजोर करती हैं, जिसे उन्होंने संविधान की मूल संरचना का हिस्सा बताया है। विनम्रतापूर्वक यह निवेदन किया जाता है कि मासिक धर्म के आधार पर महिलाओं को अपवित्र या हीन मानने में कोई तर्क या कारण नहीं है। कई धर्मों में मासिक धर्म के दौरान महिलाओं की कथित अपवित्रता के कारण उन्हें धार्मिक अनुष्ठानों में भाग लेने की अनुमति नहीं दी जाती है। अब समय आ गया कि इस संबंध में महिलाओं के साथ होने वाले ऐसे भेदभाव को समाप्त किया जाए, विशेष रूप से तब जब भारत का संविधान लैंगिक समानता में विश्वास रखता है, जो कि संविधान की मूल संरचना का एक हिस्सा है। घर से लेकर राजनीति तक, सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक और आध्यात्मिक क्षेत्रों में होने वाला यह भेदभाव, बिना किसी शक के एक वर्ग के तौर पर महिलाओं के आत्मविश्वास को हिला देता है। इसका मतलब है कि यह संविधान के अनुच्छेद 21 में निहित ष्गरिमाष् का उल्लंघन करता है।

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