नई दिल्ली, 14 जुलाई (ता)। मध्य प्रदेश के दक्षिण-पश्चिमी क्षेत्र स्थित धार से प्राप्त 12वीं शताब्दी की लाल बलुआ पत्थर की एक प्रसिद्ध प्रतिमा की पहचान को लेकर करीब 900 वर्षों से चला आ रहा भ्रम अब समाप्त हो गया है। लंबे समय तक विद्वानों द्वारा इस प्रतिमा को देवी सरस्वती के रूप में माना जाता रहा, लेकिन नए वैज्ञानिक अध्ययन के बाद इसे देवी गायत्री की प्रतिमा के रूप में चिन्हित किया गया है।
मध्य प्रदेश के धार से प्राप्त और भोपाल के राज्य संग्रहालय में संरक्षित 900 साल पुरानी एक ऐतिहासिक प्रतिमा को लेकर एक बड़ा भ्रम दूर हो गया है. जिसे अब तक पुरातत्वविद और आम लोग ज्ञान की देवी मां सरस्वती (वाग्देवी) की मूर्ति मान रहे थे, वह आधुनिक 3डी मैपिंग तकनीक और वैज्ञानिक जांच में देवी गायत्री की प्रतिमा निकली है. शोधकर्ताओं ने पाया कि मूर्ति के हाथों में मां सरस्वती की पारंपरिक पहचान ‘वीणा’ नहीं है, बल्कि वेद और कमल का फूल हैं, जो सनातन शास्त्रों के अनुसार मां गायत्री की मूर्ति होने का प्रतीक हैं। विज्ञान के इस नए शोध ने न केवल सदियों पुराने भ्रम को तोड़ दिया है, बल्कि धार के ऐतिहासिक संदर्भों को भी एक बिल्कुल नया आयाम दे दिया है।
दरअसल, भोपाल के म्यूजियम में रखी यह लाल बलुआ पत्थर की मूर्ति दक्षिण-पश्चिमी मध्य प्रदेश के धार जिले से मिली थी। यह कभी परमार राजवंश की राजधानी हुआ करता था।
इतिहासकार और पुरातत्वविद् बीके लोखंडे के अनुसार, गुप्त काल के बाद से मां सरस्वती की लगभग हर मूर्ति में देवी मां के हाथों पर वीणा दिखाई देती है। लेकिन इसमें वीणा नहीं है। वीणा के स्थान पर देवी के हाथों में वेद और कमल हैं। श्रीमद् देवी भागवत पुराण और शिल्पशास्त्र में मां गायत्री के हाथों में वेद और कमल बताया गया है। इससे पता लगता है कि यह मूर्ति देवी सरस्वती की नहीं गायत्री देवी है।
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