नई दिल्ली/वॉशिंगटन, 08 मई (ता)। अमेरिका की अंतरराष्ट्रीय व्यापार अदालत ने राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के उस व्यापक कार्यकारी आदेश को रद्द कर दिया है, जिसके तहत कई देशों से आने वाले सामानों पर 25 प्रतिशत टैरिफ लगाया गया था। अदालत ने फैसला सुनाया कि राष्ट्रपति ने इन करों को लागू करने के लिए कांग्रेस (संसद) को दरकिनार कर अपने संवैधानिक अधिकार क्षेत्र का उल्लंघन किया है। इस फैसले को कानूनी चुनौती हजारों व्यवसायों का प्रतिनिधित्व करने वाले कई प्रमुख अमेरिकी व्यापार संघों ने दी थी। अदालत संघों के इस तर्क से सहमत थी कि राष्ट्रपति विधायी मंजूरी के बिना एकतरफा रूप से इतने बड़े आर्थिक उपाय लागू नहीं कर सकते। इस निर्णय ने प्रभावी रूप से उन शुल्कों पर रोक लगा दी है, जो अरबों डॉलर के अंतरराष्ट्रीय व्यापार को प्रभावित करने वाले थे। श्री ट्रंप ने न्यायपालिका पर तीखा हमला करते हुए इस पर अपनी कड़ी प्रतिक्रिया दी।
ह्वाइट हाउस में एक उद्बोधन में उन्होंने इस फैसले को अपमानजनक और ‘अमरीका विरोधी’ करार दिया। यह एक ऐसा निर्णय है जिसने तत्काल संवैधानिक चिंताएं पैदा कर दी हैं, राष्ट्रपति ने संकेत दिया कि उनके पास संबंधित न्यायाधीशों को हटाने की शक्ति है। उन्होंने कहा कि मैं उन न्यायाधीशों को बर्खास्त करने जा रहा हूं। आप न्यायाधीशों को देश चलाने की अनुमति नहीं दे सकते। कानूनी विशेषज्ञों ने तुरंत स्पष्ट किया कि अमेरिकी राष्ट्रपतियों के पास संघीय न्यायाधीशों को बर्खास्त करने का अधिकार नहीं है, क्योंकि संविधान के अनुच्छेद तीन के तहत उनकी नियुक्ति जीवन भर के लिए होती है। इसके बावजूद श्री ट्रंप ने जोर देकर कहा कि ये शुल्क राष्ट्रीय सुरक्षा और अमेरिकी नौकरियों की रक्षा के लिए महत्वपूर्ण हैं। उन्होंने यह भी कहा कि जरूरत पडऩे पर इस मामले को सुप्रीम कोर्ट तक ले जाएंगे। अदालत के इस फैसले ने वैश्विक बाजारों और उन अमेरिकी खुदरा विक्रेताओं के बीच अनिश्चितता की लहर पैदा कर दी है, जो पहले से ही कीमतों में बढ़ोतरी की आशंका जता रहे थे, जहां राष्ट्रपति के आलोचकों ने इस फैसले को कानून के शासन और शक्तियों के पृथक्करण की जीत बताया, वहीं प्रशासन के समर्थकों का तर्क है कि न्यायपालिका अमेरिका के लिए बेहतर व्यापार सौदों पर बातचीत करने की राष्ट्रपति की क्षमता में हस्तक्षेप कर रही है।
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