कई बार राजनीति बाजों व कुछ मौको पर अपने स्वार्थ के लिए बाहुबलियों द्वारा जातिवाद को बढ़ावा देने की अनकही कोशिश एक खबर और १८८२ में शुरु हुए हंटर आयोग से चली और कम होने की बजाय रोक लगाने के दावों के बावजूद यह बढ़ती ही चली गई जातिगत मनमुटाव। इस बारे में न्यायालय की यह टिप्पणी सही कही जा सकती है कि आजादी के ७५ साल बाद भी हम समाज को जातियों से मुक्त नहीं कर सके। मृत्युजंय तिवारी विनीत जैन और राहुल दीवान द्वारा १९५६ को लेकर संविधान के साथ साथ यूजीसी एक्ट का उल्लंघन बताते हुए चुनौती दी गई थी जिसकी सुनवाई करते हुए सीजेआई सूर्यकांत और जस्टिस ज्योमाला बागची की बेंच ने फैसला दिया और यूजीसी के नियमों को पलट दिया। अधिवक्ता विष्णु शंकर जैन ने दलील दी थी कि नियमों का संरक्षण उसी जाति आधारित भेदभाव को एससी एसटी और ओबीसी वर्ग का समर्थन करता है जो अनुच्छेद १४ में दिए गए समानता के अधिकार के खिलाफ है। बीती २९ जनवरी को यूजीसी के नियम को विभाजनकारी और इसके दुरुपयोग की आशंका को ध्यान में रखते हुए इस पर रोक लगाई और कहा कि सुनवाई पूरी होने तक २०१२ की नियमावाली ही प्रभावी रहेगी। जानकारी अनुसार पीठ ने पूछा कि सामान्य वर्ग के विद्यार्थियों को रैगिंग से बचाने के लिए प्रभावी तंत्र क्यों नहीं कार्रवाई कर रहे। अधिवक्ता इंदिरा जयसिंह से पूछा गया कि एससी में ऐसे लोग भी है जो आर्थिक रूप से समृद्ध हो गए हैं। जातिमुक्त समाज के लिए जो कु छ किया क्या हम उससे पीछे जा रहे हैं। सीजेआई ने अलग अलग जातियो के लिए अगल हॉस्टल के रेगुलेशन पर भी सवाल उठाया उन्होंने कहा कि भगवान के लिए ऐसा मत करो अंतरजातीय विवाह भी होते हैं। यूजीसी के नियमों पर रोक लगाते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कुछ महत्वपूर्ण सवाल भी उठाए।
शीर्ष कोर्ट के इस संदर्भ में आए फैसले के बाद देशभर में खुशियां मनाई जा रही है। अदालत के फैसले को अपनी जीत इसके विरोधी बता रहे हैं। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि मामले का राजनीतिकरण नहीं किया जाना चाहिए। इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि सीजेआई ने यूजीसी के नए नियमों पर रोक लगाकर देश को अलगाव से बचा लिया। इसे लेकर जो युवाओं द्वारा विरोध किया जा रहा था और फैसला नहीं आता तो यह विरोध मंडल आयोग के खिलाफ जो व्यवस्था शुरु हुई थी वैसा रूप भी ले सकने से इनकार नहीं कर सकते। मेरा मानना है कि यह फैसला सभी दलों के लिए सोचने और भविष्य में चुनावी रणनीति को राजनीति पर आधारित ना बनाने मार्ग प्रशस्त किया है।
यूजीसी पर आए फैसले पर वो लोग स्वागत कर रहे हैं जिन्हें लगता था कि यह भाईचारा और सदभावना को प्रोत्साहित कर सकता है। मेरा मानना है कि सरकार बरेली के निलंबित पीसीएस अधिकारी अलंकार अग्निहोत्री पर जो कार्रवाई आरोप पत्र दाखिल किए जाने की बात चल रही है फिलहाल इस मामले की शांति के लिए उसे रोका जाए। इसके साथ ही इस आंदोलन से जोड़े गए शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद आदि को नोटिस देने की बात चल रही थी उसे भी रोका जाए क्योंकि धार्मिक भावनाओं से जुड़ा मुददा है अगर ज्यादा चला तो फिर धार्मिक रूप भी ले सकता है।
लेकिन इस सबके बावजूद भी यह देखा जाना बहुत जरुरी है कि कॉपी जांचने वाले शिक्षकों और विशेषज्ञों को यह जिम्मेदारी देते समय जातियों को लेकर उनकी मानसिकता और सोच को ध्यान में रखा जाए और ऐसे शिक्षकों को तैनाती दी जाए जो किसी भावना से ग्रस्त ना हो क्योंकि पूर्व में खबरें छपी थी कि सफरदरजंग मेडिकल अस्पताल में अनुसूचित जाति जनजाति के छात्रों को जाति देखकर जांच प्रभावित की र्गई थी ऐसी खबर उस समय देश के बड़े समाचार पत्र में प्रकाशित की गई थी कि २५ छात्रों को जाति देखकर फेल कर दिया गया था। मेरा मानना है कि ऐसे शिक्षकों को समय से पूर्व सेवानिवृति दी जाए और कोई ऐसी जिम्मेदारी का कार्य ना दिया जाए जो किसी छात्र की प्रगृति में रुकावट बनते हों।
(प्रस्तुतिः- रवि कुमार बिश्नोई संपादक दैनिक केसर खुशबू टाइम्स मेरठ)
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