आजकल मीडिया की सुर्खियों में कुत्ते बंदर सांड सहित अन्य हिंसक जानवरो की चर्चा पढ़ने सुनने को मिल ही जाता है। बताते हैं कि १८८५ से पहले भी कुत्ते आदमियों को काटते थे और घायल करते थे। १८८५ में पहली बार फ्रांसीसी वैज्ञानिक लुई पाश्चर ने एक बच्चें पर रैबीज वैक्सीन का प्रयोग किया जो सफल रहा। उसके बाद हमेशा छह जुलाई को विश्व जुनोसिस दिवस मनाया जाता है। लगभग १४० साल पहले रैबीज का टीका बनने के बाद भी पीड़ितों को सरकारी अस्पतालों में वो आसानी से उपलब्ध नहीं होता। बाजार में इसकी कीमत आज भी इतनी है कि गरीब आदमी उन्हें लगवाने की सोचता भी नहीं। स्मरण रहे कि आजादी के बाद हमने सुंई से लेकर हवाई जहाज बनाने शुरु किए। हर क्षेत्र में प्रगति हुई और आज हम यह कह सकते हैं कि अब हम किसी के आश्रित नहीं है। मगर कुत्तों के हमले तब के मुकाबले बढ़े हैं लेकिन इनके हमलों से आम आदमी को बचाने और रैबीज के टीके आज भी उपलब्ध नहीं होते। आखिर ऐसा क्यों है। यह जिम्मेदारों को सोचना ही पड़ेगा। बताते चलें कि अब तो हाईकोर्ट ने भी हिंसक जानवरों से आम आदमी को बचाने के लिए कई फैसले दिए गए हैं। प्रदेश सरकार भी उनका पालन करा रही है। देश में इसके लिए बजट भेजा जा रहा है लेकिन प्रभावशाली अभियान नहीं चलाए जा रहे इसलिए सरकार व अदालतों के आदेश अफसरों की लापरवाही व उदासीनता से लागू नहीं हो रहे और बड़ी संख्या में कुत्ते लोगों को अपना शिकार यह बना रहे हैँ। एक खबर के अनुसार 6 जुलाई 1885 को लुई पाश्चर ने पहली बार किसी इंसान पर रेबीज की प्रायोगिक वैक्सीन का सफलतापूर्वक इस्तेमाल किया। मरीज 9 साल का जोसेफ मीस्टर था, जिसे एक रेबीज-ग्रस्त कुत्ते ने बुरी तरह से 14 बार काटा था। दस दिनों में 13 इंजेक्शन लगने के बाद, वह लड़का चमत्कारिक रूप से बच गया और उसे रेबीज नहीं हुआ। इस मेडिकल कामयाबी ने टीकाकरण के आधुनिक युग की शुरुआत की। दिलचस्प है कि जोसेफ मीस्टर की मां ने पाश्चर के जानवरों पर सफल परीक्षणों के बारे में सुना था, इसलिए वह अपने बेटे को बचाने की गुहार लेकर पेरिस आई। पाश्चर ने संक्रमित खरगोशों की रीढ़ की हड्डी को सुखाकर वायरस का एक कमजोर रूप तैयार किया था। मुझे लगता है कि अब सरकार व अदालत ने तो सबकुछ कर दिया लेकिन अब जनता को गांधीवादी तरीके से अपनी बात अफसरों व सरकार तक पहुंचानी पड़ेगी कि हिंसक जानवरों के प्रकोप से बचाने के लिए प्रभावी उपाय क्यों नहीं किए जा रहे। तभी शायद इनसे पीड़ित हमारी समस्याओं का समाधान हो सकता है।
(प्रस्तुतिः- रवि कुमार बिश्नोई संपादक दैनिक केसर खुशबू टाइम्स मेरठ)
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