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    Home»देश»पीएम मोदी को अजमेर शरीफ दरगाह पर चादर चढ़ाने से रोकने की अर्जी खारिज
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    पीएम मोदी को अजमेर शरीफ दरगाह पर चादर चढ़ाने से रोकने की अर्जी खारिज

    adminBy adminJanuary 6, 2026No Comments5 Views
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    नई दिल्ली 06 जनवरी। सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को अजमेर शरीफ दरगाह पर औपचारिक ‘चादर’ चढ़ाने से रोकने के निर्देश देने वाली याचिका खारिज कर दी है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा की यह मुद्दा न्याय योग्य नहीं है।

    चीफ जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्य बागची की बेंच ने याचिका पर सुनवाई करने से इनकार कर दिया, जिसमें केंद्र सरकार और उसकी एजेंसियों द्वारा इस्लामिक विद्वान ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती और अजमेर दरगाह को राज्य प्रायोजित औपचारिक सम्मान और प्रतीकात्मक मान्यता देने को भी चुनौती दी गई थी।

    याचिकाकर्ता जितेंद्र सिंह और अन्य की ओर से पेश हुए वकील वरुण सिन्हा ने कहा कि मोइनुद्दीन चिश्ती की अजमेर दरगाह पर प्रधानमंत्री द्वारा ‘चादर’ चढ़ाने की प्रथा (जिसे जवाहरलाल नेहरू ने 1947 में शुरू किया था) बिना किसी कानूनी या संवैधानिक आधार के तब से जारी है।

    CJI कांत ने सिन्हा से कहा, ‘अदालत कोई टिप्पणी नहीं करेगी क्योंकि यह मुद्दा न्याय योग्य नहीं है।’ सिन्हा ने कहा कि ट्रायल कोर्ट में एक सिविल सूट लंबित है, जिसमें दावा किया गया है कि दरगाह एक शिव मंदिर के खंडहरों पर बनाई गई थी।

    सुप्रीम कोर्ट ने साफ किया कि रिट याचिका खारिज होने का लंबित सिविल सूट पर कोई असर नहीं पड़ेगा। CJI कांत ने कहा, ‘आप जाएं और सिविल सूट में उचित राहत मांगें।’ याचिकाकर्ता जितेंद्र सिंह और ने कहा कि वे केंद्र सरकार की विभिन्न एजेंसियों द्वारा ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती को दिए जा रहे राज्य प्रायोजित औपचारिक सम्मान, आधिकारिक संरक्षण और प्रतीकात्मक मान्यता की निरंतर प्रथा से दुखी हैं।

    उनकी याचिका में कहा गया है, ‘ऐतिहासिक रिकॉर्ड बताते हैं कि मोइनुद्दीन चिश्ती विदेशी आक्रमणों से जुड़े थे, जिन्होंने दिल्ली और अजमेर पर विजय प्राप्त की और मूल आबादी का बड़े पैमाने पर दमन और धर्मांतरण किया, ये कार्य भारत की संप्रभुता, गरिमा और सभ्यतागत लोकाचार के मौलिक रूप से विपरीत हैं।

    हाजी सैयद सलमान चिश्ती ने सुप्रीम कोर्ट का शुक्रिया अदा करते हुए कहा कि यह फैसला न सिर्फ संविधान की भावना को मजबूत करता है, बल्कि भारत की गंगा-जमुनी तहजीब, भाईचारे और आपसी सौहार्द की परंपरा को भी और सशक्त करता है।

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