विकास कार्य विकसित देश हो या गांव देहात सब जगह किया जाना वक्त की सबसे बड़ी मांग है क्योंकि जहां संपन्नता होगी वहीं तरक्की का माहौल दिखाई देगा। यह तभी हो सकता है जब सामाजिक व्यवस्थाएं मजबूत हों। वर्तमान में देखने में खूब आ रहा है कि गांव कस्बे छोड़कर युवा शहरों की ओर भाग रहे हैं क्योंकि गांवों में ना सुविधाएं मिल पा रही हैं ना ही रोजगार। ऐसा नहीं है कि इसके लिए सरकार प्रयास ना कर रही हो। मगर लघु उद्योग से लेकर बड़े व्यापारी बिना सुविधाओं के उधर जाने से कतराते हैं क्योंकि वहां तक जाने के रास्ते सही नहीं होते। युवाओं को इससे रोजगार नहीं मिलता और वह शहरों के छोटी कोठरियों में रहने को मजबूर होते हैं। इस सबका कारण है विकास के लिए जारी बजट सही प्रकार से उपयोग ना होने और कुछ लोगों के जेबों में चले जाने के चलते हर आदमी आज देखता है कि कहीं गेल गैस के पाइप डालने के लिए गडडे खुद रहे है तो कहीं पानी की लाइन नाले नाली बनाने के नाम पर सड़कें काट दी जाती है मगर ठेका लेने वाली कंपनी अपने अनुबंध में लिखी बात कि निर्माण के बाद स्थिति पुराने के समान ही बनानी होगी की तरफ कोई ध्यान नहीं दे रहा। आम आदमी नाली बनाने के लिए सड़क खोद देता है लेकिन सड़क नहीं बनवाता। मोबाइल कंपनियां अपने केबल डालने के लिए सड़कें खोदती हैं लेकिन सही ंनहीं कराती। आगे चलकर यही दुर्घटनाओं का कारण बनती है और इन्हें ही इसके लिए दोषी ठहराया जा सकता है। कंपनी के अधिकारी कागजी खानापूर्ति करते हैं लेकिन गुणवत्ता का ध्यान उनके द्वारा नहीं रखा जाता जिससे नागरिक परेशानी भुगतते हैं और यह कहते हैं कि ठेकेदार के खिलाफ कार्रवाई होगी। कहने का आश्य है कि नाली या पाइप लाइन डालने वालों या नागरिकों को सुविधाओं ना देने के लिए कार्रवाई पर अमल भी होना चाहिए वरना विकास कार्य पूर्ण होते आसानी से नजर नहीं आते जब तक जिम्मेदारों से वसूली और जेल भेजने की जरुरत ना हो।
(प्रस्तुतिः- रवि कुमार बिश्नोई संपादक दैनिक केसर खुशबू टाइम्स मेरठ)
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