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    Home»देश»देश का लोकतंत्र खतरे में, नागरिकों की आखिरी उम्मीद न्यायपालिका
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    देश का लोकतंत्र खतरे में, नागरिकों की आखिरी उम्मीद न्यायपालिका

    adminBy adminJuly 4, 2026No Comments2 Views
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    नई दिल्ली, 04 जुलाई (ता)। विपक्षी ‘इंडिया’ गठबंधन के घटक दलों के नेताओं ने प्रधान न्यायाधीश न्यायमूर्ति सूर्यकांत को पत्र लिखकर कहा है कि देश का लोकतंत्र ‘‘खतरे में’’ है और जब सभी संस्थागत व्यवस्थाएं विफल हो जाती हैं, तब नागरिकों की आखिरी उम्मीद न्यायपालिका ही होती है।
    विपक्षी दलों ने इस पत्र में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) और चुनावी प्रक्रिया से जुड़े कई मुद्दों का विस्तार से उल्लेख करते हुए अपनी चिंताओं से उन्हें अवगत कराया है। बीते 28 जून को लिखे गए इस पत्र पर कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे, लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी, तृणमूल कांग्रेस प्रमुख ममता बनर्जी, समाजवादी पार्टी अध्यक्ष अखिलेश यादव सहित विपक्ष के 24 दलों के नेताओं ने हस्ताक्षर किए हैं। निर्दलीय राज्यसभा सदस्य कपिल सिब्बल ने भी पत्र पर हस्ताक्षर किए हैं।
    विपक्षी नेताओं ने कहा कि वे सामान्य परिस्थितियों में न्यायपालिका को इस प्रकार का पत्र नहीं लिखते, लेकिन उन्हें लगता है कि देश का लोकतंत्र खतरे में है और इसलिए उन्हें यह असाधारण कदम उठाना पड़ा है। उन्होंने कहा कि संसद, न्यायपालिका, मीडिया और कार्यपालिका लोकतंत्र के प्रमुख स्तंभ हैं तथा इन संस्थाओं के बीच संतुलन और सहयोग से ही लोकतांत्रिक व्यवस्था मजबूत रह सकती है। विपक्षी नेताओं ने स्वतंत्र एवं निष्पक्ष चुनाव को लोकतंत्र की बुनियाद बताते हुए कहा कि चुनावी प्रक्रिया में किसी भी प्रकार की गड़बड़ी जनता की वास्तविक इच्छा को प्रभावित कर सकती है। उन्होंने आरोप लगाया कि कई मामलों में चुनाव परिणाम मतदाताओं की वास्तविक पसंद को प्रतिबिंबित नहीं करते और निर्वाचन आयोग की निष्पक्षता पर गंभीर सवाल खड़े हुए हैं।
    पत्र में निर्वाचन आयोग और विशेष रूप से मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार के नेतृत्व में कराए जा रहे मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) की प्रक्रिया पर सवाल उठाए गए हैं। विपक्षी नेताओं ने आरोप लगाया कि बिहार में शुरू की गई इस प्रक्रिया का उद्देश्य मतदाता सूचियों की शुचिता सुनिश्चित करना कहा गया, लेकिन इसके क्रियान्वयन से बड़ी संख्या में मतदाताओं के मताधिकार से वंचित होने की आशंका पैदा हो गई है। उन्होंने दावा किया कि दस्तावेज आधारित सत्यापन प्रक्रिया गरीबों, अशिक्षितों, दलितों, आदिवासियों, अल्पसंख्यकों और प्रवासी श्रमिकों के लिए ‘‘बहिष्कार वाली’’ साबित हो सकती है। पत्र में यह भी कहा गया कि एसआईआर की प्रक्रिया के दौरान प्रशासनिक भ्रम, पारदर्शिता की कमी और नियमों में बार-बार बदलाव जैसी समस्याएं सामने आईं। विपक्षी नेताओं ने आरोप लगाया कि वर्ष 2014 के बाद निर्वाचन आयोग में हुई नियुक्तियों को लेकर लगातार संदेह पैदा हुआ है और आयोग का आचरण, विशेषकर मुख्य निर्वाचन आयुक्त का रवैया, पक्षपातपूर्ण रहा है। उनका आरोप है कि चुनावी प्रक्रिया के दौरान निर्वाचन आयोग का सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के प्रति ‘‘खुला समर्थन’’ दिखाई दिया और आदर्श आचार संहिता के उल्लंघन के मामलों में आयोग ने समान व्यवहार नहीं किया।
    पत्र में ‘अनूप बरनवाल बनाम भारत संघ’ मामले का उल्लेख करते हुए विपक्षी दलों ने कहा कि उच्चतम न्यायालय की संविधान पीठ ने मुख्य चुनाव आयुक्त की नियुक्ति के लिए अधिक स्वतंत्र और पारदर्शी व्यवस्था की आवश्यकता पर बल दिया था, लेकिन बाद में संसद द्वारा बनाए गए कानून में प्रधान न्यायाधीश को चयन समिति से बाहर कर दिया गया, जिससे नियुक्ति प्रक्रिया पर सरकार का नियंत्रण बढ़ गया।
    विपक्षी दलों ने दावा किया कि एसआईआर की प्रक्रिया के तहत मतदाता सूचियों से बड़े पैमाने पर नाम हटाए गए हैं। उन्होंने हाल ही में संपन्न पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव का विशेष उल्लेख करते हुए दावा किया कि वहां केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बल (सीएपीएफ) के 2.40 लाख जवानों की तैनाती की गई और मतदाता सूची से लाखों नाम हटाए गए। उन्होंने आरोप लगाया कि मतगणना केंद्रों पर पक्षपातपूर्ण व्यवस्था, बड़े पैमाने पर अधिकारियों के तबादले और आयोग द्वारा नियुक्त अधिकारियों की तैनाती ने चुनावी प्रक्रिया को संदिग्ध बना दिया।
    विपक्षी नेताओं ने यह भी दावा किया कि दिल्ली, हरियाणा और महाराष्ट्र में हाल में हुए चुनावों में भी हेरफेर किया गया और चुनावी प्रक्रियाओं में व्यापक सुधार की आवश्यकता है। पत्र में प्रस्तावित एसआईआर प्रक्रिया को तत्काल स्थगित करने और इसे ऐसे समय लागू करने की मांग की गई है, जब संबंधित राज्यों में विधानसभा चुनाव में कम से कम पांच वर्ष का समय हो, ताकि आयोग के प्रतिनिधि दस्तावेज आधारित प्रक्रिया के बजाय घर-घर जाकर मतदाताओं का सत्यापन कर सकें।
    विपक्षी दलों ने इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीनों (ईवीएम) की विश्वसनीयता पर भी सवाल उठाए और कहा कि चुनावी प्रक्रिया में जनविश्वास बनाए रखने के लिए इस मुद्दे पर व्यापक सार्वजनिक चर्चा की आवश्यकता है। उन्होंने आवश्यकता पड़ने पर मतपत्र प्रणाली को फिर से लागू करने पर विचार करने की भी मांग की। पत्र में यह आरोप भी लगाया गया है कि केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (सीबीआई), प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) और राष्ट्रीय जांच एजेंसी (एनआईए) जैसी केंद्रीय एजेंसियों का इस्तेमाल मुख्य रूप से विपक्षी दलों को निशाना बनाने, चुनावी परिणामों को प्रभावित करने और निर्वाचित सरकारों को अस्थिर करने के लिए किया जा रहा है। पत्र के अंत में विपक्षी नेताओं ने न्यायपालिका पर भरोसा जताते हुए कहा कि उनका उद्देश्य किसी लंबित मामले को प्रभावित करना नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक संस्थाओं में जनता के विश्वास को मजबूत करना है। उन्होंने कहा कि यदि न्यायपालिका भी लोगों की चिंताओं का समाधान करने में विफल रहती है, तो यह प्रश्न खड़ा होता है कि नागरिक आखिर किस संस्था की ओर देखें।

    Desh New Delhi tazza khabar tazza khabar in hindi The country's democracy is in danger; the judiciary is the citizens' last hope.
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