प्राकृतिक संतुलन स्वास्थ्य और फसल के लिए हानिकरण कीड़ों आदि का सफाया करने में सक्षम गौरेया का हमारे जीवन में हमेशा ही महत्वपूर्ण स्थान रहा है गोरैया मात्र एक पक्षी ही नहीं बचपन में मनोरंजन और बच्चों को सक्रिय बनाये रखने में भी महत्वपूर्ण योगदान करती थी क्योंकि जब यह चहचहाते हुए घर के आंगन या बाहर लगे पेड़, घर की मुंडेर और कभी कभी घर के चौक में आकर चहचहाट करती थी तो माहौल हल्का फुल्का कर देती थी और बच्चे जब इसे पकड़ने भागते थे तो वह भाग जाती जिससे हम सक्रिय रहते थे और अगर घर में किसी बात को लेकर तनाव होता तो इसकी आवाज और निरंतर शोर मचाने चहचह करने की आवाज सुनकर वह तो दूर होता ही था हमारे मन में एक संवेदना भी पैदा होती थी परिणाम स्वरूप चावल या अन्य खाद्य सामग्री के रूप में इसके खाने के लिए डालते थे कहने का मतलब यह है कि अपने कृषि प्रधान देश में गोरैया एक महत्वपूर्ण स्थान था लेकिन अब शहरों में जंगल कटते पेड़ और जगह की कमी ने अपने परिवार की महत्वपूर्ण अंग गोरैया को हमसे दूर कर दिया है कभी कभी यह कमी हमे भावनात्मक शून्यता का एहसास भी कराती है। गोरैया का भारतीय साहित्यिक चित्रण और साहित्य में इतना गहरा है कि इस पर कई कविता गीत और कहानी प्रचलित हैं महाकवि सूरदास ने गोरैया को भगवान कृष्ण की लीलाओं का साक्षी बताया। साहित्यकार महादेवी वर्मा की कविताओं में गोरैया प्राकृतिक संगीत का माध्यम बनीं उनके निहार काव्य संग्रह में गोरैया की चहचहाट को वर्षा की पूर्व सूचना के रूप में भी बताया गया है। वर्ड लाइफ इंटरनेशनल के हिसाब से भारत में गोरैया की संख्या 1960 के दशक में 60-70 प्रतिशत घटी और अब दिल्ली एनसीआर में इसकी आबादी 90 प्रतिशत तक कम हो गयी है।
बताते हैं कि इसके कई कारण हैं जैसे अब छप्पर के बने घर कम नजर आते हैं कीटनाशक दवाई के छीड़काव में खेतों में कीड़े जो इसके मुख्य भोजन होते थे वह समाप्त हो गये और अगर कहीं हैं तो उनसे इसे खतरा है क्योंकि पर पर कीटनाशक दवाईयों का छिड़काव होता हैं कई अध्ययनों में शहरीकरण जलवायु परिवर्तन को भी गोरैया की घटती संख्या के लिए जिम्मेदार माना जाता है। हमें याद है कि जब इसे भागदौड़ करके पकड़ते थे और इसके पंखों में रंग लगाते थे तब यह कुछ समय तक तो गुमशुम रहती थी लेकिन कुछ ही देर में उड़ जाती थी और इसके लौटने पर सारी बच्चे खुश हो जाते थे। शहरों के साथ साथ ग्रामों में भी ज्यादातर पक्के मकान बनाये जा रहे हैं ओर खेत व जंगल काटकर कालोनियां बनने लगी हैं जिससे बदामदे में गूंजने वाली इसकी आवाज कम होती जा रही हैं। बचपन में गोरैया के आने के कई शुभ संकेत हुआ करते थे। हमारा मानना है कि गोरैया की संख्या बढ़े इसके अंडे सुरक्षित रहे और उनसे होने वाले बच्चे हष्टपुष्ट हों इसके लिए गांवों में तो अभी फिर भी काफी जगह है बस थोड़ा सा दाना जो इसे प्रिय हो वह रख दिया जाये तो इसका आना जीवित रहना और संख्या बढ़ना तीनों ही तय हो सकते हैं बताते चलें कि गोरैया के बचाने के प्रति जागरूकता हेतु 20 मार्च 2010 को गोरैया सुरक्षा दिवस की शुरूआत हुई। और अब पशु-पक्षी प्रेमी इस दिवस को मनाते हैं और कुछ मीडिया में आने वाली खबरों से इसका अहसास होता है मगर यह ठीक नहीं गोरैया हमारे जीवन और निश्चल खुशियों के लिए जरूरी है फिलहाल भारत में नेचर फारफ्यूचर सोसायटी और फ्रांस की इकोसिस एक्शन फाउंडेशन इसे बचाने के लिए काम कर रही हैं। मुझे लगता है कि हम सब मिलकर अगर प्रयास करें तो हमारे जीवन में खुशियां लाने का प्रतीक गोरैया का पुनरू आगमन सुनिश्चित कर सकते है।
कहने सुनने में तो इनके बचाने के लिए जो सुझाव दिये जा रहे हैं वह सही लगते हैं लेकिन जीवन की आपाधापी एक-दूसरे से आगे निकलने की होड़ इसने 200 गज में बनाया तो मैं 500 गज में बनाऊ अपना घर की सोच के चलते शहरों में इस चिड़िया की संख्या कैसे बढ़ाई जा सकती है इस बारे में मेरा मानना है कि घर में नहीं तो घर के बाहर एक ऐसा वृक्ष लगाये जो इसे प्रिय हो तथा खुले स्थानों में पेड़ लगाकर वहां इसके घोंसले बनाये जाये और उनमें प्रतिदिन इसके भोजन से संबंध खाद्य सामग्री रखी जाये और खेतों में हम छप्पर की झोपड़ी भी बना सकते हैं जिसमें हम खुद भी आराम करें और इनका घर भी बना रहे।
तो यह बात विश्वास से कही जा सकती है कि गोरैया आयेगी और चहचहायेगी और परिवार के बच्चे खुश होंगे हम भी जो संवेदनहीन हो रहे हैं इससे संबंध पुरानी यादों को ताजा कर प्राकृतिक के रंग में रंग सकते हैं। गोरैया के जीवन में बड़ा योगदान है। इसलिए विलुप्त हो रहे पर्यावरण चक्र को बनाये रखने हेतु इन पेड़ों के आसपास हम दाना पानी रखकर गोरैया को आमंत्रित कर सकते हैं आओ जीवन में महत्वपूर्ण स्थान रखने वाली गोरैया और पेड़-पौधें का संरक्षण की शपथ लें और जहां तक हो सके इन दोनों के फलने-फूलने हेतु कुछ समय और कुछ आर्थिक साधन इस काम में लगाये तो यह विश्वास के साथ कहा जा सकता है कि गोरैया की संख्या बढ़ेंगी हमारे जीवन में नई खुशहाली आयेगी और सोच आदि बनेगी जिसके चलते हम संवेदनशील बनेंगे और संवेदनविहिनता से जो नई नई बीमारियां पैदा हो रहीं है वह समाप्त होंगी लेकिन इस काम को सिर्फ सरकार या अफसरशाही पर नहीं छोड़ा जाना चाहिए आम आदमी को भी इस तरफ ध्यान देकर जैसे हम रोजमर्रा के काम करते हैं वैसे ही गोरैया के संरक्षण के लिए भी कुछ समय निकलें।
(प्रस्तुतिः- रवि कुमार बिश्नोई संपादक दैनिक केसर खुशबू टाइम्स मेरठ)
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