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    Home»देश»संभल हिंसा मामले में एएसपी अनुज चौधरी को राहत, इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एफआईआर के आदेश पर लगाई रोक
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    संभल हिंसा मामले में एएसपी अनुज चौधरी को राहत, इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एफआईआर के आदेश पर लगाई रोक

    websitemarketing2019@gmail.comBy websitemarketing2019@gmail.comFebruary 10, 2026No Comments3 Views
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    प्रयागराज 10 फरवरी। संभल हिंसा केस मामले में पूर्व सर्कल ऑफिसर अनुज कुमार चौधरी को इलाहाबाद हाईकोर्ट से राहत मिल गई है. कोर्ट ने मंगलवार को संभल कोर्ट के उस आदेश पर रोक लगा दी, जिसमें अनुज कुमार चौधरी समेत कई पुलिसवालों के खिलाफ भीड़ पर कथित तौर पर गोली चलाने के आरोप में एफआईआर दर्ज करने का आदेश दिया गया था.

    रोक के बाद, कोर्ट ने मामले की सुनवाई 24 फरवरी को तय की. यह मामला यामीन की शिकायत से जुड़ा है, जिन्होंने तत्कालीन सीजेएम विभांशु सुधीर के सामने एक अर्जी दी थी, जिन्होंने बीएनएसएस की धारा 173(4) के तहत अर्जी मंजूर कर ली थी.

    अपनी शिकायत में, यामीन ने आरोप लगाया था कि 24 नवंबर, 2024 को सुबह करीब 8.45 बजे, उनका बेटा आलम, संभल के मोहल्ला कोट में जामा मस्जिद के पास अपने ठेले पर ‘पपीते’ (रस्क) और बिस्कुट बेच रहा था, तभी कुछ पुलिसवालों ने जान से मारने के इरादे से भीड़ पर गोली चला दी.

    याचिका में संभल थाने के इंचार्ज अनुज कुमार तोमर और अनुज चौधरी का नाम था. अपने 11 पेज के आदेश में, सुधीर ने कहा कि पुलिस क्रिमिनल कामों के लिए “ऑफिशियल ड्यूटी” की आड़ नहीं ले सकती.

    सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का जिक्र करते हुए, सीजेएम ने कहा कि किसी व्यक्ति पर गोली चलाना सरकारी काम का निर्वहन नहीं माना जा सकता. यह पाते हुए कि पहली नजर में एक कॉग्निजेबल अपराध का खुलासा हुआ था. सीजेएम कोर्ट ने यह नतीजा निकाला कि सच्चाई का पता सिर्फ सही जांच से ही लगाया जा सकता है.
    सीजेएम विभांशु सुधीर के इस ऑर्डर को पास करने के ठीक एक हफ्ते बाद, हाई कोर्ट ने उनका ट्रांसफर सुल्तानपुर कर दिया था.

    इस मामले की इलाहाबाद हाईकोर्ट में सोमवार और मंगलवार को सुनवाई हुई. सुनवाई के दौरान एडिशनल एडवोकेट जनरल (AAG) मनीष गोयल ने तर्क दिया कि मजिस्ट्रेट ने कानून के तहत जरूरी सुरक्षा उपायों को नजरअंदाज करके बीएनएसएस की सीमाओं को पार किया.

    राज्य और पुलिस अधिकारी के लिए दलीलें शुरू करते हुए गोयल ने कहा कि यह ऑर्डर कानूनी तौर पर टिकने लायक नहीं है, क्योंकि सीजेएम ने FIR का आदेश देने के लिए सेक्शन 175 BNSS के तहत शक्तियों का इस्तेमाल किया, लेकिन वह प्रोविजन में सख्त प्रोसीजरल सुरक्षा उपायों का पालन करने में नाकाम रहे, जो सरकारी काम करने वाले सरकारी कर्मचारियों की सुरक्षा के लिए बनाए गए हैं.

    उन्होंने सेक्शन 175(4) BNSS का जिक्र किया, जो सरकारी कर्मचारियों को उनके ऑफिशियल कामों के दौरान किए गए कामों के संबंध में बेकार और परेशान करने वाले क्रिमिनल केस से बचाने की कोशिश करता है.

    राज्य ने आगे तर्क दिया कि शिकायतकर्ता (कथित पीड़ित के पिता) द्वारा सीजेएम के सामने दायर की गई एप्लीकेशन, जिस पर विवादित आदेश पास किया गया था, में शुरू में पुलिस स्टेशन जाने का जिक्र नहीं था, जो कानून के तहत एक शर्त है.

    एएजी गोयल ने कहा कि वह कानून से आगे निकल गए…पूरी पुलिस रिपोर्ट को नजरअंदाज कर दिया जिसमें कहा गया है कि घटना के बारे में केस दर्ज किया गया है और जांच की जा रही है. उन्होंने हिस्सा ‘ए’ लिया, हिस्सा ‘बी’ को नजरअंदाज कर दिया…यह फोरम शॉपिंग जैसा है, जो एक मुकदमा करने वाला करता है.

    उन्होंने कानून की सीमाओं का उल्लंघन किया है, जो उन्होंने जोर देकर कहा, “यह पूरी तरह से गलत है.” एएजी ने यह भी कहा कि नवंबर 2024 की संभल हिंसा कोई अकेली घटना नहीं थी, बल्कि उस जगह पर हुए हंगामे से शुरू हुई थी.

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