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    Home»देश»परिवार की संयुक्त आमदनी से अर्जित संपत्ति बेनामी नहीं
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    परिवार की संयुक्त आमदनी से अर्जित संपत्ति बेनामी नहीं

    adminBy adminJanuary 15, 2026No Comments7 Views
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    प्रयागराज,15 जनवरी। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा है कि संयुक्त हिंदू परिवार की साझा आमदनी से खरीदी गई संपति को बेनामी संपत्ति नहीं कहा जा सकता है। कोर्ट ने गोरखपुर के दो भाइयों के बीच चल रहे संपत्ति विवाद में ट्रायल कोर्ट के आदेश को रद्द करते हुए मुकदमे को फिर से सुनवाई के लिए बहाल कर दिया है।

    गोरखपुर के ओम प्रकाश गुप्ता की अपील पर न्यायमूर्ति संदीप जैन ने यह आदेश दिया है। कोर्ट ने कहा कि ट्रायल कोर्ट ने बेनामी लेनदेन निषेध अधिनियम, 1988 की गलत व्याख्या के आधार पर वाद खारिज किया था जबकि मामला संयुक्त हिंदू परिवार की संपत्ति से संबंधित है और इसमें साक्ष्यों के आधार पर तथ्यात्मक जांच की आवश्यकता है।

    मामले के अनुसार, ओम प्रकाश गुप्ता ने अपने बड़े भाई राधेश्याम गुप्ता के खिलाफ दावा किया था कि दोनों भाइयों ने संयुक्त परिवार के रूप में लकड़ी और गन्ने का व्यवसाय शुरू किया था। इसी व्यवसाय से अर्जित आय से गोरखपुर में कई जमीनें और मकान खरीदे गए। कुछ संपत्तियां भाई के नाम, कुछ मां के नाम और कुछ बेटों के नाम दर्ज कराई गईं, लेकिन सभी की खरीद साझा पूंजी से की गई थी। बाद में जब बड़े भाई ने हिसाब देने और बंटवारे से इनकार कर दिया, तो वादी ने अदालत में मुकदमा दायर किया।

    ट्रायल कोर्ट ने प्रतिवादी की अर्जी स्वीकार करते हुए वाद को बेनामी कानून के तहत अवैध मानकर खारिज कर दिया था। हाईकोर्ट ने इस आदेश को गलत ठहराते हुए कहा कि ऑर्डर 7 नियम 11 सीपीसी के तहत वाद खारिज करते समय केवल वादपत्र में वर्णित तथ्यों पर ही विचार किया जा सकता है।

    मामले का विवाद 1990 के दशक में खरीदी गई एक संपत्ति से जुड़ा था। अपीलकर्ता का कहना था कि यद्यपि संपत्ति का टाइटल उसके भाई के नाम पर है, लेकिन वास्तव में वह संयुक्त परिवार के लाभ के लिए खरीदी गई और एक मौखिक पारिवारिक समझौते द्वारा शासित थी। उसने बेनामी लेन-देन निषेध कानून के तहत न्यासी/विश्वासपात्र क्षमता (फिड्युशियरी कैपेसिटी) के अपवाद का भी सहारा लेने की कोशिश की। हाइकोर्ट ने इन दलीलों को अस्वीकार करते हुए कहा कि कथित पारिवारिक समझौते के अस्तित्व, उसकी शर्तों या उसके क्रियान्वयन को सिद्ध करने के लिए कोई भी ठोस दस्तावेज़ी साक्ष्य प्रस्तुत नहीं किया गया। अदालत ने दोहराया कि यद्यपि पारिवारिक समझौता मौखिक भी हो सकता है, लेकिन उसका अस्तित्व तभी माना जा सकता है, जब स्पष्ट, भरोसेमंद और ठोस साक्ष्य हों जिनसे यह साबित हो कि पक्षकारों के बीच वास्तविक सहमति थी और उस पर अमल भी किया गया। वर्तमान मामले में प्रतिवादी इस कसौटी पर पूरी तरह असफल रहे।

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