नई दिल्ली, 09 मई (ता)। अपरा एकादशी के दिन तुलसी, चंदन, कपूर, गंगाजल सहित भगवान विष्णु की पूजा की जानी चाहिए। कहीं-कहीं बलराम-कृष्ण का भी पूजन करते हैं।
कथा : प्राचीनकाल में महीध्वज नामक एक धर्मात्मा राजा था। उसका छोटा भाई वज्रध्वज बड़ा ही क्रूर, अधर्मी तथा अन्यायी था। वह अपने बड़े भाई से द्वेष रखता था। उस अवसरवादी पापी ने एक दिन रात्रि में अपने बड़े भाई की हत्या करके उसकी देह को एक जंगली पीपल के नीचे गाड़ दिया। इस अकाल मृत्यु से राजा प्रेतात्मा के रूप में उसी पीपल पर रहने लगा और अनेक उत्पात करने लगा। अकस्मात एक दिन धौम्य नामक ऋषि उधर से गुजरे। उन्होंने प्रेत को देखा और तपोबल से उसके अतीत को जान लिया। अपने तपोबल से प्रेत उत्पात का कारण समझा। ऋषि ने प्रसन्न होकर उस प्रेत को पीपल के पेड़ से उतारा तथा परलोक विद्या का उपदेश दिया। दयालु ऋषि ने राजा की प्रेत योनि से मुक्ति के लिए स्वयं ही अपरा (अचला) एकादशी का व्रत किया और उसे अगति से छुड़ाने को उसका पुण्य प्रेत को अर्पित कर दिया। इस पुण्य के प्रभाव से राजा की प्रेत योनि से मुक्ति हो गई। वह ऋषि को धन्यवाद देता हुआ दिव्य देह धारण कर पुष्पक विमान में बैठकर स्वर्ग को चला गया।
नियम : व्रत के दिन शौचादि से निवृत्त होकर स्नान करना चाहिए। फिर व्रत का संकल्प करना चाहिए। दिन भर काम करते हुए ही भगवान का सुमिरन करते रहना चाहिए। भगवान विष्णु का सुमिरन करते हुए पूजादि में कमी के लिए उनसे क्षमा मांगनी चाहिए। व्रत में फलाहार का प्रयोग किया जा सकता है, ताकि स्वास्थ्य पर कोई विपरीत प्रभाव न पड़े। गर्मियों के दिनों में पानी का सेवन भी खूब करना चाहिए। अपनी सामथ्र्य के अनुसार इस दिन दान आदि भी करना चाहिए। सुबह और शाम के समय, दो बार मंदिर में मत्था टेकने भी जाना चाहिए। इस दिन किसी से गाली-गलोच से बचना चाहिए। विष्णु भगवान की कथा का पाठ भी करना चाहिए। अपनी सामथ्र्य के अनुसार ब्राह्मणों को भोजन भी कराना चाहिए। रात को फलाहार करें तथा दूसरे दिन सुबह भोजन करने से पहले गाय को रोटी भी रखनी चाहिए। इन नियमों का पालन करने से भगवान का आशीर्वाद जरूर मिलता है।
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