एनजीटी हरित विकास अधिकरण प्रदूषण को रोकने के लिए नए नए आदेश दे रहा है और अदालत भी ऐसे मामलों में सख्त नजर आ रहा है और सरकार भी इससे होने वाले नुकसान से नागरिकों को बचाने के लिए प्रयास कर रही है। बीते दिनो खबर पढ़ी कि पराली जलाने वाले किसानों के खिलाफ कार्रवाई कर जुर्माना वसूला गया। आज खबर पढ़ी कि मेरठ के एनसीआर क्षेत्र में बढ़ते प्रदूषण को ध्यान में रखते हुए खरदौनी गांव में कई कोल्हू संचालकों पर कार्रवाई करते हुए नौ कोल्हू सील कर दिए।
प्रदूषण से होने वाले नुकसान और बीमारियां की रोकथाम जरुरी है। ऐसा करने वालों पर कार्रवाई होनी ही चाहिए। आज एक खबर पढ़ी कि मेडिकल कॉलेज में फिर जला बायो मेडिकल वेस्ट। बीते दिनों खबर सुनी कि शहरों के बीचो बीच कूड़ा जलाया गया। सवाल यह उठता है कि रात दिन मेहनत कर आम आदमी को गुड़ गेहूं चावल अन्य खाद्य सामग्री उपलब्ध कराने वाले किसानों के तो कोल्हू भी सील किए जा रहे है और पराली जलानेपर चालान हो रहे हैं लेकिन मेडिकल कॉलेज और शहर में जलने वाले कूड़े के जिम्मेदारों पर ऐसी कार्रवाई क्यों नहीं हो रही जिससे कूड़े और उसके धूंए से आम आदमी को छुटकारा मिले। मेरा मानना है कि प्रदूषण फैलाने वालों पर नियमानुसार कार्रवाई हो लेकिन नियम बनाने वाले अगर कूड़ा जलाकर प्रदूषण फैलाते हैं तो वह ज्यादा दोषी है। अब कोल्हू पर सील लगाने वाले मेडिकल कॉलेज में जाकर जिन लोगों ने बायो मेडिकल वेस्ट जलाकर प्रदूषण फैलाया उन पर कार्रवाई करे। और स्वास्थ्य विभाग को भी लिखा जाए क्योंकि स्वास्थ्य विभाग की जिम्मेदारी और भी ज्यादा बढ़ जाती है। वह खुद ही प्रदूषण फैलाएंगे तो कैसे काम चलेगा। यह बात सही है कि मेडिकल वेस्ट फेंकने वाली एजेंसी के साथ ही कॉलेज प्राचार्य और प्रशासनिक अधिकारी से भी जवाब तलब होना चाहिए कि रैन बसेरे के पास बायो मेडिकल वेस्ट क्यों जलाया जा रहा है। ऐसा करने वाले एजेंसी का ठेका निरस्त हो। इसी तरह आशियाना कॉलोनी और पुलिस लाइन में कूड़ा जलाने की खबर पढने को मिली।
(प्रस्तुतिः- रवि कुमार बिश्नोई संपादक दैनिक केसर खुशबू टाइम्स मेरठ)
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