देश के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू का जन्मदिन बाल दिवस के रूप में मनाया जाता है। क्योकि वो बच्चों को प्यार भी करते थे और उनकी सुविधाओं के लिए काम भी । इसलिए बच्चे उन्हें चाचा नेहरू कहकर बुलाते थे। आज आजाद देश के प्रधानमंत्री नेहरूजी के जन्मदिन पर दिल्ली में अंतरराष्ट्रीय मेले का शुभारंभ होता है जिसमें देशभर के नागरिकों के नई तकनीकी आदि की जानकारी मिलती है। लेकिन मुझे लगता है कि सरकार के सारे प्रयासों के बाद भी बाल दिवस को लेकर जो दूरगामी सोच थी उन पर अभी पूरा काम नहीं हो पाया है क्योंकि आज भी शिक्षा कई बच्चों के लिए दूर की बात है और जिनके पास है वो फीस ना देने पर होने वाली बेइज्जती से मौत को अपनाते हैं। कई मजदूरी करने के लिए मजबूर है। सरकार बाल श्रम राकने के लिए होटलों ढाबों में छापेमारी करती है। यह कहने में कोई हर्ज नहीं है कि जो बच्चों की शिक्षा और श्रम से दूर रखने के लिए जिम्मेदारों द्वारा और कामों पर खर्च होने के चलते गरीब का बच्चा हर व्यवस्था से दूर खड़ा समाज और सरकार की ताक रहा है कि उसे कब पूर्ण शिक्षा मिलेगी।
देश में हर सफलता आज के बच्चे कल के युवा की कार्यप्रणाली और सोच पर निर्भर करती है। लेकिन जिस प्रकार से युवा अपनी भूमिका निभा रहे हैं लेकिन उनके खानपान, पढ़ाई और रहने की व्यवस्था सरकार कराए तो एक बात कही जा सकती है कि बच्चे रामराज लाने और पुनरू सोने की चिड़िया व दूध की उपलब्धता सुनिश्चित करने में सफल रहेंगे। जानकारों के अनुसार बाल दिवस केवल उत्सव का दिन नहीं है बल्कि यह सभी की भलाई करने की याद दिलाता है। हमें बच्चों के अधिकारों की रक्षा, समान अवसर प्रदान करना, समाज में यह जागरूकता फैलाना कि वह समान है वह गरीब हो या अमीर उसका धर्म जाति कोई भी हो। शायद इसी की याद दिलाने के लिए सरकारी कार्यालयों शिक्षा संस्थानों समामाजिक शैक्षिक संगठनों में बाल दिवस मनाया जा रहा है। हर साल आज के दिन ऐसा होता है लेकिन मुझे लगता है कि बच्चे इस बारे में क्या सोचते हैं और यह दिन क्यों बनाया जाता है इसके लिए उन्हें सही गलत का अहसास कराने अपनी बात परिवार और घर से बाहर कहने के लिए उनमें आत्मविश्वास की सोच जागरूक करना बड़ी बात है। इसके लिए उनसे नियमित रूप से संवाद हो क्योंकि यह देश की असली पूंजी है। इन्हें अच्छे संस्कार दिए जाए तो यह संभव है।
कुछ लोगों का कहना है कि बच्चों के मानसिक सांस्कृतिक विकास के लिए अच्छी पुस्तकों का उपलब्ध होना सबसे जरूरी है। इस बात से मैं भी इनकार नहीं करता। यह तो होना ही चाहिए लेकिन बच्चों के चौमुंखी विकास और हर बात की जानकारियां बिना खर्च किए उपलब्ध हो इसके लिए अभिभावकों को सोशल मीडिया का ज्ञान इन्हें कराने के साथ यह भी बताया जाए कि अपने परिवार और देशहित में क्या देखना चाहिए क्योंकि जिस प्रकार से पुस्तको की कीमत आसमान छू रही है। कई प्रकाशक स्कूल संचालक और विक्रेेता दस रूपये की किताब को ५०० रूपये में बेच रहे हैं। यह सबके बस में खरीदना नहीं है। ऐसे में सोशल मीडिया की अच्छी साइटों जो पढ़ाई में मार्गदर्शन कर सके उनका अवलोकन किया जा सके तो एक बात विश्वास से कही जा सकती है बिना संसाधन और ज्यादा खर्च किए बिना भी हम बहुत कुछ कर सकते हैं। बाकी तो भगवान ने जो सोच रखा है वो होना है लेकिन कर्म हमें आगे बढ़ाने सफलता दिलाने में भूमिका निभाता है और जो बच्चे यह करते हैं भगवान उनका साथ देने के लिए उपलब्ध रहते हैं। सिर्फ कहने का मतलब है कि मैंने बचपन में बहुत कुछ देखा है। बड़ी बड़ी बात करने वाले असलियत में क्या होते हैं सफेदकॉलर धारियों की सोच क्या होती है उनमें से कुछ अपना नाम चमकाने फोटो छपवाने के लिए क्या प्रपंच करते हैं और बच्चों के हित के लिए बने आश्रमों के कुछ पदाधिकारी मिलने वाले धन का दुरूपयोग करते हैं और अखबारों में जो पढ़ने को मिलता है उससे बच्चों का यौन शोषण करने वाले भी कम नहीं है। हर मामले में नकारात्मक सोच को आत्मसात नहीं किया जा सकता। इसलिए आओ जैसा माहौल है उसी में बच्चों को आगे बढ़ाने के लिए अपनी जिम्मेदारियों को पूरा करें और बच्चों का स्वर्णिम भविष्य बनाने का प्रयास करें तभी इस बाल दिवस का उददेश्य साकार हो पाता है।
(प्रस्तुतिः- रवि कुमार बिश्नोई संपादक दैनिक केसर खुशबू टाइम्स मेरठ)
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