मेडा आवास विकास शहर के सौंदर्यीकरण और विकास के लिए आम आदमी को उपलब्ध कराने के लिए बनाए गए विभाग अपने मूल काम पर नागरिकों के अनुसार असफल हैं। लोगों का कहना है कि इन विभागों ने व्यवस्था की परिभाषा बदल दी है। नीचे से ऊपर तक के ज्यादातर अफसर सुविधाएं जुटाने और हर वो काम कराने जो नहीं हो सकता सक्रिय हो रहे हैं। हम क्या कहें मगर जो इन विभागों की हठधर्मी और मनमर्जी के चलते कट रही कच्ची कॉलोनियों अवैध निर्माण और सरकारी जमीन घेरे जाने से आम आदमी प्रभावित हो रहा है उसका मानना है कि इन विभागों के अधिकारी कर्मचारी ज्यादातर झूठ बोलते हैं। अवैध निर्माण पर जरा सा धक्का लगने पर अवैध निर्माण ध्वस्त करते हैं। अवैध कॉम्लैक्सों पर सील भी लगाई जाती है और निर्माणकर्ताओं पर एफआईआर कराई जाती हैलेकिन उससे कुछ नहीं होता। खबरें फोटों मीडिया में छपवाई जाती है लेकिन मौकों पर दावों के अनुसार कुछ नहीं होता।
इसके उदाहरण के रूप में पिछले पांच साल में जितने भवनों के ध्वस्तीकरण, सील लगाने या एफआईआर की बात की जाती है वो सिर्फ कागजो पर सीमित रहता है। कितने ही नागरिकों का कहना है कि मेडा आवास विकास के अधिकारी मौके का मुआयना करे या किसी उच्च प्रशासनिक अधिकारी की टीम बनाकर मौका मुआयना किया जाए तो इन विभागों के अधिकारियों के दावों का पर्दाफाश होगा ही सरकार को जो अरबों रूपये के राजस्व के नुकसान का भी पर्दाफाश होगा ही। इस बारे में जानकारों के अनुसार जो जानकारी दी जा रही है उसे ध्यान में रखकर यह कहा जा सकता है कि पहले जो सूची घोषित होने की बात चल रही है उन क्षेत्रों में पांच साल में जितने अधिकारी रहे उनकी सूची तैयार कर अवैध कॉलोनी निर्माणों की समीक्षा कराई जाए और भविष्य में ऐसा ना हो उसके लिए दोषियों पर कार्रवाई की जाए तभी सरकारी नीतियों का पालन, कट रही कच्ची कॉलोनियों पर प्रतिबंध लग सकता है।
मान्य मुख्यमंत्री जी संबंधित विभागों के अधिकारियों के यह कहने से पहले कच्ची कॉलोनियों का विवरण नहीं दिया गया है इसलिए जांच संभव नहीं है इसके लिए पांच सालों में जहां जहां सील लगाई गई वहां का मौका मुआयना कराया जाए।
(प्रस्तुतिः- रवि कुमार बिश्नोई संपादक दैनिक केसर खुशबू टाइम्स मेरठ)
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