विहिप के संगठन मंत्री को शहाजीपुर में फर्जी धोखाधड़ी और रंगदारी के मामले में मुकदमा दर्ज कर जेल भिजवाने वाली एडीएम वित्त एवं राजस्व रितु पूनिया को शासन ने हटाकर उन्हें प्रतीक्षारत करते हुए उनके स्थान पर प्रसुन द्विवेदी की नियुक्ति की है। बताते चलें कि विहिप के विभागीय संगठन मंत्री पर फर्जी शिकायत करने और रंगदारी मांगने का आरोप लगाते हुए कोतवाली में मुकदमा दर्ज कराया। उसके बाद शुरू हुई राजनीतिक हलचल के उपरांत एडीएम का कहना था कि विहिप के संगठन मंत्री प्रिंसा गौड़ ने एक शिकायती पत्र कमिश्नर बरेली को दिया था जिसमें अधिक जुर्माना लगाने का आरोप लगाया गया। उनका कहना था कि इस बारे में कोई भी निजी व्यक्ति बयान नहीं दे सकता है। एडीएम का कहना था कि एक कॉलोनी की धारा ८० करने को लेकर एडीएम पर आरोप लगाया गया जबकि ऐसा करने का अधिकार एडीएम पर है। गलत मनोवैज्ञानिक तरीके से दबाव बनाया गया जिस पर प्रिंस को जेल भिजवा दिया गया। शासन की कार्रवाई के बाद और विहिप द्वारा आंदोलन की चेतावनी के बाद बैकफुट पर आई एडीएम ने कहा कि सौंपी गई विवेचना में प्रिंस के खिलाफ रंगदारी के साक्ष्य नहीं मिले हैं। इस आधार पर गत मंगलवार को उन्हें जेल से रिहा कर दिया गया। अपने पद के गुरूर में एडीएम का यह कहना कि कोई निजी व्यक्ति बयान नहीं दे सकता बिल्कुल गलत है। अब प्रिंस गौड़ की रिहाई तथा एडीएम को प्रतीक्षारत किए जाने से भी यह बात स्पष्ट हो गई है। आम नागरिकों की इस बात में दम नजर आता है कि इस प्रकार के फैसले लेने वाली एडीएम को शासन द्वारा जिम्मेदारी वाले पदों से दूर रखा जाना चाहिए क्योंकि उनके द्वारा की गई कार्रवाई दमनकारी और डराने व निरकुंश है। नागरिकों का ध्यान हटाने का प्रयास ही कहा जा सकता है। विहिप के संगठन मंत्री प्रिंस गौड़ रिहा हो गए। एडीएम रितु पूनिया प्रतीक्षारत कर दी गई लेकिन सरकार और शासन को कुछ ऐसे इंतजाम करने चाहिए कि इस तरह से आम आदमी का उत्पीड़न जैसी कार्रवाई की पुनरावृति ना हो क्योंकि ऐसे मामलों से समाज में जिम्मेदार पदों पर बैठे लोगों से विश्वास कम होने लगता है जिसे सही नहीं कहा जा सकता।
(प्रस्तुतिः- रवि कुमार बिश्नोई संपादक दैनिक केसर खुशबू टाइम्स मेरठ)
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