हमारी सरकारें स्कूलों की पुरानी बिल्डिंगे तुड़वाकर उन्हें नया बनाने एवं और स्कूल खुलवाने के लिए भरपूर प्रयासरत है जिससे हर बच्चा साक्षर हो सके। यह अभियान कितना सफल है और इससे जुड़े लोग इसे कितना कामयाब होने देगे यह तो भविष्य में पता चलेगा लेकिन फिलहाल सुप्रीम कोर्ट के अनुसार बच्चों को गैस चौंबर में नहीं डाल सकते। जहरीली हवाओं में स्कूली खेलों की तैयारी पर टिप्पणी करते हुए कहा कि व्यस्क लोग प्यूरीफायर चालू करके बंद जगहों पर बैठे हैं। स्कूलों को खेल टालने का निर्देश जारी करें। क्योंकि जैसा दिखाई दे रहा है उस हिसाब से सरकारें खेलों को बढ़ावा देने और खिलाड़ियों को आगे लाने के लिए तो प्रयासरत नजर आ रही है लेकिन गैंस चौंबर से उन्हें बचाए की जिम्मेदारी से भाग रही हैं। ऐसे में मुझे लगता है कि सुप्रीम कोर्ट का निर्णय सही है क्योंकि जब तक यह गैस चौंबर के रूप में फैला प्रदूषण समाप्त नहीं होगा तब तक ना तो इस व्यवस्था का कोई औचित्य नजर नजर आता है। न्यायालय से अलग हटकर भी देखा जाए तो स्कूली बच्चों के वाहनों के जो मानक तय किए गए हैं उन पर ना तो बच्चों की संख्या को लेकर और ना ही फिटनेस के मामले में पालन नहीं हो पा रहा लगता है। बताते चलें कि आरटीओ द्वारा इनसे होने वाली दुर्घटना और प्रदूषण को रोकने के लिए बड़े बड़े दावे किए जा रहे हैं लेकिन घरों से स्कूल तक जाने वाले वाहन नियमों पर उतरते नजर नहीं आते हैं और जिस रास्ते से यह गुजरते हें वहां प्रदूषण का गुब्बार छोडते चले जाते हैं और चालकों की लापरवाही तथा बच्चों के जीवन से होने वाले खिलवाड़ दुर्घटनाओं के मामलें में गंभीर नहीं माना जा रहा है। मुझे लगता है कि जीवन में स्वास्थ्य के लिए खेल भी जरूरी है। बच्चे आगे बढ़ने और परिवार की खुशहाली के लिए शिक्षा बहुत जरूरी है। सरकार को चाहिए कि अपने आप संज्ञान लेकर या इस बारे में जनहित याचिकाओं का संज्ञान लेकर खेल और शिक्षा के लिए उचित माहौल स्थापित करने हेतु सभी प्रकार की प्रदूषण की समाप्ति हेतु इसे फैलाने और रोकने के लिए जिम्मेदार प्रदूषण विभाग, शिक्षा और आरटीओ अफसरों के खिलाफ कार्रवाई होनी चाहिए क्येांकि देश का भावी भविष्य विकास के लिए कार्य करेगा लेकिन बचपन से ही यह प्रदूषण से अपनी इच्छाशक्ति कमजोर और बीमारियों का शिकार हो गया तो कैसे चलेगा काम।
(प्रस्तुतिः- रवि कुमार बिश्नोई संपादक दैनिक केसर खुशबू टाइम्स मेरठ)
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