नई दिल्ली, 01 मई (ता)। पश्चिम एशिया संकट को लेकर अमेरिका और ईरान के बीच वार्ता पर अनिश्चितताओं का असर भारत पर भी पड़ता दिखने लगा है। वैश्विक बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में तेजी के असर को आम भारतीयों की जेब पर पड़ने से ज्यादा दिनों तक नहीं टाला जा सकता।
गत दिवस अंतराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें 126.41 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गईं जो पिछले चार में सबसे अधिक है। घरेलू मुद्रा बाजार में डॉलर के मुकाबले रुपया भी 95 के मनोवैज्ञानिक स्तर को पार कर गया।
इससे वित्त मंत्रालय से लेकर आरबीआई तक के अधिकारियों के माथे पर दोहरी चिंता की रेखाएं गहरी हो गई हैं। वैसे बाजार बंद होने के समय रुपया 94.84 के स्तर पर (पिछले कारोबारी दिन के मुकाबले चार पैसे कमजोर) था, लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि रुपया 95 के ऊपर अब असामान्य नहीं कहा जाएगा।
इन घटनाक्रमों के बीच यह भी तय है कि सरकारी तेल कंपनियों के लिए अब पेट्रोल एवं डीजल की खुदरा कीमतों को मौजूदा स्तर पर रखना संभव नहीं होगा। उम्मीद यही है कि पूर्व की तरह इस बार भी देश में पेट्रोल व डीजल की खुदरा कीमतें थोड़ी-थोड़ी करके बढ़ाई जाएंगी। गत दिवस बाजार खुलने के समय से ही भारतीय रुपया 95 के स्तर पर रहा और एक समय वह 95.34 के स्तर पर चला गया था। इसके पहले रुपये ने 95 के स्तर को 30 मार्च, 2026 को पार किया था। आरबीआई की कोशिश है कि रुपया 95 के स्तर से नीचे रहे। यही वजह है कि गत दिवस भी केंद्रीय बैंक ने मुद्रा बाजार में तेजी से हस्तक्षेप किया, जिसकी वजह से रुपये को फिर से 95 के स्तर से नीचे लाया जा सका। जियोजित इन्वेस्टमेंट्स लिमिटेड के वीके विजय कुमार (चीफ इनवेस्टमेंट स्ट्रैटेजिस्ट) ने इसके लिए तीन कारण गिनाए। पहला, ब्रेंट क्रूड का 126 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंचना जिससे भारत का व्यापार घाटा व चालू खाते का घाटा और बढ़ने का डर है।
दूसरा, भारतीय बाजार से विदेशी संस्थागत निवेशकों का लगातार बाहर निकलना। तीसरा, अमेरिका में 10 वर्ष वाली प्रतिभूतियों पर ब्याज की दर बढ़कर 4.4 प्रतिशत पर पहुंचना, इससे भारतीय शेयर बाजार से एफआईआई की निकासी बढ़ने की संभावना है।
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