नई दिर्ल्ली, 23 अप्रैल (ता)। सुप्रीम कोर्ट ने महत्वपूर्ण फैसले में कहा है कि उत्तर प्रदेश जमींदारी उन्मूलन और भूमि सुधार अधिनियम, 1950 के तहत उप-विभागीय अधिकारी (एसडीओ) के पास सार्वजनिक उपयोग की भूमि के रूप में दर्ज भूमि की श्रेणी बदलने का कोई अधिकार नहीं है, ताकि उस पर भूमिधारी अधिकार दिए जा सकें।
जस्टिस प्रशांत कुमार मिश्रा और एनवी अंजारिया की पीठ ने फैसले में स्पष्ट किया है कि ‘भूमि की श्रेणी में किसी भी तरह के बदलाव के लिए जमींदारी उन्मूलन अधिनियम में केवल एक ही तरीका कहा गया है, जो धारा 117(6) में मिलता है। धारा 117(6) में राज्य सरकार और केवल राज्य सरकार को ही यह अधिकार देती है कि वह ग्रामसभा से भूमि वापस ले ले और एक नई घोषणा करके उस भूमि को किसी स्थानीय प्राधिकरण को सौंप दे।’ सुप्रीम कोर्ट ने उत्तर प्रदेश के हरदोई जिले में चरागाह भूमि पर दिए गए पट्टों को रद्द करने के इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले को सही ठहराते हुए अपना फैसला सुनाया है।
सुप्रीम कोर्ट ने फैसला सुनाया कि उत्तर प्रदेश ज़मींदारी उन्मूलन और भूमि सुधार अधिनियम, 1950 के तहत एक उप-विभागीय अधिकारी के पास सार्वजनिक उपयोग की ज़मीन के तौर पर दर्ज ज़मीन का वर्गीकरण बदलने का कोई अधिकार नहीं है, ताकि उस पर भूमिधरी अधिकार दिए जा सकें।
वैसे भी, उन्मूलन अधिनियम उप-विभागीय अधिकारी को ज़मीन की श्रेणी बदलने का कोई अधिकार नहीं देता है ताकि उसे धारा 132 के निषेधात्मक दायरे से बाहर लाया जा सके। ज़मीन की श्रेणी में किसी भी बदलाव के लिए उन्मूलन अधिनियम में एकमात्र तरीका धारा 117(6) में कहा गया, जो राज्य सरकारकृऔर केवल राज्य सरकारकृको यह अधिकार देता है कि वह गाँव सभा से ज़मीन वापस ले ले और एक नई घोषणा करके ऐसी ज़मीन को किसी स्थानीय प्राधिकरण को सौंप दे।
जस्टिस प्रशांत कुमार मिश्रा और जस्टिस एनवी अंजारिया की खंडपीठ ने यूपी के हरदोई ज़िले में चारागाह की ज़मीन पर दिए गए पट्टों को रद्द करने के फैसले को सही ठहराया। खंडपीठ ने माना कि यह ज़मीन यूपी भूमि सुधार अधिनियम, 1950 की धारा 132 (वह ज़मीन जिस पर भूमिधरी अधिकार नहीं मिलेंगे) के तहत सार्वजनिक उपयोग की ज़मीन थी और इसे निजी अधिकारों के लिए आवंटित नहीं किया जा सकता। कोर्ट ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के उस फैसले को सही ठहराया, जिसमें यह पाया गया कि उप-विभागीय अधिकारी के पास ज़मीन की श्रेणी को श्रेणी-6 से श्रेणी-5 में बदलने का कोई अधिकार नहीं था और इस आधार पर दिए गए पट्टे अमान्य थे।
यह विवाद उस ज़मीन से जुड़ा था, जो मूल रूप से 31 अक्टूबर, 1992 से पहले खतौनी में श्रेणी-6 के तौर पर दर्ज थी। उत्तर प्रदेश भूमि अभिलेख नियमावली के अनुच्छेद ए-124 के तहत श्रेणी-6 में बंजर या बिना खेती वाली ज़मीन, पानी से ढकी ज़मीन, और गैर-कृषि उद्देश्यों जैसे सड़कों और इमारतों के लिए इस्तेमाल होने वाली ज़मीन शामिल है। 5 अप्रैल, 1992 को लेखपाल ने रिपोर्ट दी कि गाँव सभा ने ज़मीन की श्रेणी बदलकर श्रेणी-5 करने का प्रस्ताव पारित किया, जो खेती योग्य ज़मीन को दर्शाता है। राजस्व निरीक्षक और नायब तहसीलदार ने भी इसी तरह की सिफारिशें की थीं। इन रिपोर्टों पर कार्रवाई करते हुए तहसीलदार ने 31 अक्टूबर, 1992 को ज़मीन के वर्गीकरण में बदलाव की सिफ़ारिश की, और उप-विभागीय अधिकारी ने उसी तारीख को इसे मंज़ूरी दी। इसके बाद अपीलकर्ता और अन्य लोगों को पट्टे दिए गए, और उनके नाम राजस्व रिकॉर्ड में दर्ज कर लिए गए।
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