लखनऊ, 23 अप्रैल। हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच ने एक जनहित याचिका पर सुनवाई के दौरान अस्पतालों में वेंटिलेटर की उपलब्धता को लेकर गंभीर सवाल उठाए हैं। न्यायालय ने कहा है कि यदि मरीजों को आवश्यकता पड़ने पर वेंटिलेटर उपलब्ध ही नहीं हो पा रहे हैं, तो वेंटिलेटरों की संख्या के संबंध में प्रस्तुत आंकड़ों का कोई औचित्य नहीं रह जाता। कोर्ट ने राज्य सरकार से पूछा है कि चिकित्सा सुविधाओं के लिए कुल बजट का कितना हिस्सा आवंटित किया गया है और अस्पतालों में सुविधाओं की स्थिति क्या है। अगली सुनवाई 25 मई को होगी।
यह आदेश न्यायमूर्ति राजन रॉय व न्यायमूर्ति मंजीव शुक्ला की खंडपीठ ने वी द पीपल संस्था की ओर से दाखिल याचिका पर दिया है। न्यायालय ने कहा कि प्रश्न यह है कि क्या कोई भी अस्पताल इस स्थिति में है कि वह शपथपत्र पर यह कह सके कि जब भी किसी मरीज को वेंटिलेटर की आवश्यकता होती है, तो अस्पताल उसे उचित समय के भीतर वेंटिलेटर उपलब्ध करा देगा और यदि ऐसा नहीं है, तो शपथपत्र में दिए गए आंकड़ों का कोई अर्थ नहीं रह जाता।
न्यायालय ने तल्ख टिप्पणी करते हुए कहा कि प्रस्तुत आंकड़े इस पहलू पर संतोषजनक नहीं हैं, वस्तुतः ऐसा प्रतीत होता है कि राज्य में यह निर्धारित करने की कोई व्यवस्था ही नहीं है कि अस्पताल में वेंटिलेटर की मांग क्या है और जीवन बचाने हेतु कितने वेंटिलेटर उपलब्ध होने चाहिए, जब तक यह व्यवस्था विकसित नहीं की जाती, तब तक इस प्रकार के आंकड़े देना निरर्थक होगा। न्यायालय ने राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग (एनएमसी) और केंद्र सरकार को भी पक्षकार बनाते हुए नोटिस जारी करने का आदेश दिया है। न्यायालय ने निजी अस्पतालों व क्लीनिकों के नियमन तथा उनकी फीस और सेवाओं की निगरानी व्यवस्था की जानकारी भी मांगी।

