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    हेलमेट ना होने एवं काले शीशे के लिए चालान करने से प्रतिबंधों का पालन संभव नहीं है, पुलिस को अपने व्यवहार और आचार में करना होगा बदलाव

    adminBy adminApril 21, 2026No Comments1 Views
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    गाड़ियों के काले शीशे पर प्रतिबंध किस आश्य से लगाया यह अलग बात है लेकिन एक दशक से देखने को मिल रहा है कि देशभर में गाड़ियों में लगे काले शीशे हटाने, कार व बाइक से स्टंट करने और तेज आवाज वाले हॉर्न बजाने पर रोक लगाने के लिए वाहन मालिकों के चालान किए जा रहे हैंं तथा हॉर्न व काली पन्नी उतारी जा रही है। यातायात पुलिस की जगह जगह डयूटी लगी होने के बाद भी यह प्रतिबंध लागू क्यों नहीं हो पा रहे। जबकि पिछले कुछ दिनों में मीडिया में पढ़ने सुनने को मिला कि कुछ लोगों के चालान किए गए। स्टंट करने पर गाडियां सीज की गई और काले शीशे लगाने वालों को यह अहसास कराया गया कि वह गलत कर रहे हैं लेकिन ज्यो ज्यो दवा की मर्ज बढ़ता ही गया के समान कभी सड़क सुरक्षा सप्ताह तो कभी चौकिंग अभियान चलने के बाद भी आखिर सरकार का यह नियम पूर्ण रुप से लागू क्यों नहीं हो पा रहा यह विषय सोचने का है। बीते दिनों पटाखों की आवाज निकालने वाली बुलेट बाइक के चालान हुए। मगर परिणाम वही ढाक के तीन पात। काले शीशे लगाकर स्टंट करते हॉर्न बजाते आज भी लोग देखे जाते हैं। ऐसा क्यों हो रहा है। इस बारे में एक नागरिक का यह कहना सही लगा कि यह सारे कदम आम आदमी पर ही आजमाए जाते हैं। कुछ वीआईपी को इस व्यवस्था से जो छूट दी जाती है या उनकी गलतियों को नजरअंदाज किया जाता है जैसे आम आदमी का हेलमेट न लगाने व तीन बैठने पर चालान किया जाएगा मगर कई बार पुलिसकर्मी खुद बिना हेलमेट व बाइक पर तीन सवारी लेकर जाते दिखाई देते हैं मगर उनको रोका टोका नहीं जाता। इसलिए मेरी निगाह में यह प्रतिबंध लागू नहीं हो पा रहे हैं। एक फिल्म में दारोगा पत्रकार के हेलमेट ना लगाने पर चालान करने में लगे थे तभी एक जानकार वहां से निकल रही थी। उसने देखा और दारोगा से आग्रह किया कि पत्रकार भूलवश हेलमेट नहीं लगा पाए होंगे। दारोगा के ना मानने पर उसने अपने मोबाइल से दारोगा की लाइव वीडियो बनाई कि हेलमेट ना लगाने पर चालान कर रहे हैं लेकिन इन्होंने खुद भी हेलमेट नहीं लगा रखा है। इस पर दारोगा ने कहा कि लाइव बंद करो मैं चालान नहीं काट रहा। यह ऐसी घटनाएं है जिससे आम आदमी को दो चार होना पड़ता है। कानून जनता की सुविधा के लिए बनाए जाते हैं उत्पीड़न के लिए नहीं लेकिन सड़क सुरक्षा सप्ताह में जो पुलिसवाले लोगों को फूल देकर नियमों का ज्ञान कराते हैँ उसके खत्म होते ही चालान की संख्या बढ़ाकर राजस्व बढ़ाने के लिए अभियान चलाए जाते हैं वो ही मुझे लगता है कि इन प्रतिबंधों के लागू होने का मुख्य कारण हो सकता है। हम बात करने पर कोई टोका टकी करे तो ऐसा दोबारा न हो इसकी कोशिश करते हैं लेकिन भय नाम की चीज एक बड़े तबगे में नहीं है। दुष्कर्म आदि रोकने के लिए कानून में अपराधों के लिए फांसी उम्रकैद की सजा निर्धारित है लेकिन अपराध रुकने के बजाय बढ़ते ही जा रहे हैं जो इस बात का प्रतीक है कि डर दिखाकर नियमों का पालन नहीं कराया जा सकता। कुल मिलाकर कहने का मतलब है कि पुलिस पब्लिक भाई भाई का नारा जो दिया जाता है भाई भी ना समझो तो एक नागरिक का अपमान करने की बजाय और चालान ना करके उसे दोबारा गलती करने पर परेशानी होगी कहकर मौका दिया जाए तो चालान करने की जरुरत ही ना पड़े। क्योंकि बार बार किसी को आप परेशान करेंगे तो वह ठीक हो जाता है। अगर आप बड़े परिवार से हैं और नाम भिखारी दास है तो भिखारी वाली प्रवृति है और आप साधनविहीन है और नाम राजा है तो राजा वाली पृवूति होती है। अगर किसी का अपमान किया जाए तो उसका डर निकल जाता है। इलाके में एक बदमाश सड़क पर घूमता था तो लोग डरकर इधर उधर हो जाते थे। उसने एक सज्जन युवक को थप्पड़ मारे तो वह दोबार उसके सामने से सीना तानकर निकलने लगा। इसी तरह पुलिस को अपना व्यवहार सुधारने और नागरिकों को सम्मान देने की बड़ी आवश्यकता है तभी इन बातों पर रोक लग सकेगी। ऐसा मेरा भी मानना है।
    (प्रस्तुतिः- रवि कुमार बिश्नोई संपादक दैनिक केसर खुशबू टाइम्स मेरठ)

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