सीजेआई के अलावा जस्टिस बीवी नागरत्ना, जस्टिस सुंदरेश, जस्टिस एहसानुद्दीन, जस्टिस अरविंद कुमार, जस्टिस ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह, जस्टिस प्रसन्ना बी वराले, जस्टिस आर महादेवन और जस्टिस जायमाला बराची आदि की प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत जी की अध्यक्षता वाली नौ न्यायाधीशों की संविधान पीठ जो आजकल धार्मिक स्थलों में महिलाओं से भेदभाव के साथ कानूनी सवालों पर विचार कर रही हैं के द्वारा की गयी टिप्पणी अत्यंत महत्वपूर्ण है कि कोई भी चीज अंधविश्वास है कि नहीं यह तय हम करेंगे शीर्षक से छपी खबर में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि मंदिर में प्रवेश सीमित करने से समाज बंटेगा धर्म मजबूत नहीं कमजोर होगा। प्रतिबंध से समाज बंटेगा जो हिन्दू धर्म के लिए अच्छा नहीं है। अदालत ने कहा कि सभी को मठ मंदिर में प्रवेश का पूर्ण अधिकार हो इस संदर्भ में कोई कानून बने तो उसे सार्वजनिक व्यवस्था नैतिकता स्वास्थ्य की कसौटी पर खरा उतरना होगा जैसे बिन्दु जो इन मामलों में उभर कर आ रहे हैं उससे यह स्पष्ट है कि मंदिर मठों में प्रवेश में भेदभाव किसी के लिए भी अच्छा नहीं है अदालत जो निर्णय लेगी वह अलग है लेकिन समाज में जो आज बहुसंख्यकों को संगठित करने की जो व्यवस्था तभी पूरी हो सकती है जब महिला पुरूष वृद्ध और बच्चे मंदिरों में जाने की अनुमति हो और समाज के किसी भी वर्ग जो इससे संबंध है उससे कहीं भी जाने से रोका नहीं जाना चाहिए। कहीं महिलाओं के मंदिर जाने पर रोक तो कहीं पुरूषों के साथ ऐसा हो रहा है जिस कारण केरल के कुछ मंदिरों में पुरूषों को महिलाओ की भांति श्रंगार कर और साड़ी पहनकर कुछ मंदिरो में जाने की बात भी सामने आ रही है। यह भले ही एक धार्मिक परंपरा के हिसाब से हो रहा लेकिन अब समाज में हर वर्ग भगवान के प्रति पहले के मुकाबले ज्यादा समर्पित भाव से आस्था रखता है ऐसे में किसी भी प्रकार के अंधविश्वास के चलते बहुसंख्यक समाज में बिखराव हो जाने की संभावनाओं से इंकार नहीं किया जा सकता। वैसे तो इस संदर्भ में अदालत सरकार और प्रमुख नागरिकों में उच्चस्तरीय विचार-विमर्श चल रहे हैं मगर आम आदमी के दृष्टिकोण से देखा जाये तो सबसे पुराने हिन्दू संस्कृति से जुड़े सनातन धर्म को और आगे बढ़ाने के लिए सभी जातियों और वर्गों के हिन्दू समाज से जुड़े लोगों को हर मंदिर और पूजा स्थान में अगर वह आस्था के साथ पहुंचता है तो उसे पूर्ण सम्मान और पूजा का अधिकार मिलना चाहिए जो उसके मानवीय अधिकारों से भी जुड़ा है। बाकी तो जो फैसला सुप्रीम कोर्ट देगा या जो नीति सरकार बनायेगी अथवा जिसको सर्व समाज द्वारा मान्यता दी जायेगी वही सही है भगवान सबके हैं केवट ने राम जी को पार लगाया था अपनी नाव मैं बैठाकर तो भगवान ने सबरी के झूठे बेर भी खाये थे क्योंकि वह उनकी श्रद्धाभाव से ऐसा किया जा रका है तो सबकुछ छोड़कर मानव जाति जो हमारे हिन्दू धर्म और सनातन धर्म में आस्था रखते हैं उनमें भेदभाव बिल्कुल भी ठीक नहीं कहा जा सकता। वर्तमान समय में भी समाज में भाईचारा, सद्भाव वक्त की सबसे बड़ी मांग बन रहा है और यह सबकों बराबर का अधिकार धर्म और पूजा के मामले में सभी को दिया जाये तभी यह संभव होगा। माननीय उच्च न्यायालय ने तो अपना मत स्पष्ट कर दिया है।
(प्रस्तुतिः- रवि कुमार बिश्नोई संपादक दैनिक केसर खुशबू टाइम्स मेरठ)
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