आज कल नाबालिगों में बढ़ रही हिंसा की प्रवृति तेज हो गई लगती है। इसके उदाहरण के रुप में दो दशक में कम उम्र के बच्चों द्वारा घटनाओं को अंजाम दिया गया उसका विवरण इंटरनेट पर देख सकते हैं। मुरादाबाद में कई साल पहले डीआईजी पर हमला किया गया था। मैनाठोर बवाल के दोषी खुद को नाबालिग बताकर कम सजा की कोशिश कर रहे हैं। आजकल दुष्कर्म हिंसा हिंस्ट्रीशीटर से भी ज्यादा दरिंदगी करने वाले पकड़े जाने पर नाबालिग होने का फायदा उठाना चाहते हैं और सुधार गृहों में इनका हंगामा किसी से छिपा नहीं है। कुछ साल पहले मेरठ के सुधार गृह में किशोरों ने एक आदमी की हत्या कर दी थी।
इसे देखते हुए मुझे लगता है कि छोटे अपराधों में सजा ना देने की बात हो रही है और अदालत का मानना है कि बिना सजा के सुनवाई में ही जेल में रखना सजा से कम नहीं है उसी प्रकार जब अच्छे काम हो रहे हैं तो कानून का दुरुपयोग रोकने के लिए नियमों में बदलाव भी किया जाए। मेरा मानना है कि अपराधियों की सजा में कमी हो लेकिन किसी को भी नाबालिग होने के नाम पर यह अधिकार नहीं दिया जाना चाहिए वो कुछ भी करे हिंसा बलात्कार हत्या की घटनाओं को अंजाम दे और बाद में खुद को नाबालिग बताए यह अब चलने वाला नहीं है। सरकार को योजना बनाकर अदालतों व कानूनविदों को सौंपनी चििाहए जिससे नाबालिगों द्वारा जघन्य अपराधों को रोकने में सफल हो सके और समाज में इनका भय खत्म हो।
(प्रस्तुतिः- रवि कुमार बिश्नोई संपादक दैनिक केसर खुशबू टाइम्स मेरठ)
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