गंगा जमुनी तहजीब और सांप्रदायिक सौहार्द को बढ़ावा देने वाला पिछले ३५० साल से लग रहे नौचंदी मेले की गरिमा आयोजकों द्वारा गिराने और इसके आयोजन में होने वाली बंदरबाट की ओर पहली बार प्रांतीय मेला बनने के बाद से पांच साल बाद किसी सामाजिक संगठन से जुड़े व्यक्ति द्वारा मजबूती से सवाल खड़े करते हुए कहा जा रहा है कि मेला कुछ लोगों की मनमानी की भेंट चढ़ रहा है। बताते चलें कि २०२१ में इसे प्रांतीय मेले का रुप मिला। तब से हमेशा अपने इर्द गिर्द घूमने वाले कुछ लोगों की समिति बनाकर मेला आयोजित और उसमें मनमानी की जाती रही। पिछले साल मेले के लिए बनी कमेटी के कुछ सदस्यों ने अनियमितताओं के सवाल उठाए थे। जिन्हें इस बार समिति में शायद जगह नहीं मिली। सच संस्था के अध्यक्ष सामाजिक कार्यकर्ता और आरटीआई एक्टिविस्ट डॉ संदीप पहल द्वारा गत दिवस अपने इस्टर्न कचहरी रोड स्थित कार्यालय पर प्रेसवार्ता में कहा गया कि मेला नौचंदी की गरिमा को ठेस पहुंचा रहे हैं अधिकारी। नौचंदी मेले के आयोजन में गबन के आरोप भी उन्होंने लगाए। संदीप पहल का कहना है कि मेले के बजट में बंदरबाट ज्यादा और काम कम होता है। उन्होंने कहा कि १५ मार्च को मेले का शुभारंभ हुआ। एक महीने तक यह मेला उदघाटन के बाद नहीं लग पाता है। यह सब ठेकेदारों को दुकानदारों से पैसा बटोरने और उसकी बंदरबाट का मौका दिया जाता है। संदीप पहल का कहना है कि वो इस बारे में मंडलायुक्त व डीएम को शिकायत भेजकर मांग कर चुके हैं। जल्द ही आयोजन में होने वाले घोटाले का पर्दाफाश भी करेंगे। संदीप पहल का कहना है कि जिला प्रशासन को मेले के लिए शासन से लाखों रुपये दिए जाते हैं और मेले की गरिमा हर साल कम होती जा रही है। मेले को लेकर डॉक्टर संदीप पहल ने जो सवाल उठाए जागरुक नागरिक उसका स्वागत कर रहे हैं। कई लोगों का कहना है कि प्रांतीय मेला हो गया था तो वो जनप्रतिनिधियों की देखरेख में डीएम की अध्यक्षता में लगना चाहिए था। नगर निगम पर तो पहले से ही बड़े आरोप इसे लेकर लगते रहे हैं। एक मेला प्रेमी ने कहा कि नौचंदी मैदान पटेल मंडप और दुकानें सही कराने एवं महापुरुषों की प्रतिमाओं के जीर्णोद्धार के नाम पर हर साल लाखों रुपये खर्च होते है। इसकी स्थायी देखभाल करने और मेले की जमीन घिरने से रोकने के प्रयास क्यों नहीं किए जाते।
बताते चलें कि मेरठ के प्रथम मेयर अरुण जैन के जमाने में मेला अपनी गरिमा और परंपरा के अनुसार हुआ था। उसके बाद से इस मेले की व्यवस्था बिगड़ती चली गई। होली से दूसरे रविवार को उदघाटन होता था और १५ दिन के अंदर मेला शुरु हो जाता था। नवरात्र में वहां भक्तों की भीड़ लगती थी और सप्तमी से दशमी तक दर्शनार्थियों का इतना जमावड़ा होता था कि आसानी से निकलना संभव नहीं होता था। उसके बाद से मेले की गरिमा परंपरा लगभग समाप्त होती चली आ रही है। क्योंकि एक माह बाद भी मेला शुरु नहीं हो पाता और सप्तमी से दशमी तक अभी मेला क्षेत्र की सफाई भी नहीं हो पाई है। संदीप पहल का यह प्रयास मेले की गरिमा बनाने में मील का पत्थन साबित होगा यह बात नागरिक विश्वास से दोहरा रहे हैं। स्मरण रहे कि संदीप पहल द्वारा अनेक सामाजिक मुददों को लेकर सवाल उठाए गए और उनका समाधान कराने का प्रयास किया जाता रहा। मैंने देखा कि संदीप पहल पर दो दशक में कोई ठोस आरोप नहीं लगा और ना ही वो विवादों में रहे। उन्होंने जो कहा मेले के बारे में अगर वो इस काम पर लग गए तो अगले साल से मेला अपनी गरिमा और परंपरा के अनुसार लगने लगेगा। यह बात विश्वास से कही जा सकती है।
(प्रस्तुतिः- रवि कुमार बिश्नोई संपादक दैनिक केसर खुशबू टाइम्स मेरठ)

