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    Home»देश»पति को भरण-पोषण मामले में पत्नी के एडल्टरी के सबूत के तौर पर वॉट्सऐप चैट पेश करने की इजाजत
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    पति को भरण-पोषण मामले में पत्नी के एडल्टरी के सबूत के तौर पर वॉट्सऐप चैट पेश करने की इजाजत

    adminBy adminFebruary 26, 2026No Comments2 Views
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    प्रयागराज 26 फरवरी। उत्तर प्रदेश की इलाहाबाद हाई कोर्ट ने पति के मेंटनेंस मामले पर दायर याचिका पर सुनवाई के क्रम में बड़ा आदेश जारी किया है। हाई कोर्ट ने मेंटेनेंस केस में पत्नी के कथित एडल्टरी (गैर मर्द के साथ बातचीत) के सबूत के तौर पर व्हाट्सएप चैट रिकॉर्ड पेश करने की अनुमति दे दी है। हाई कोर्ट ने ट्रायल कोर्ट के उस आदेश को निरस्त कर दिया, जिसमें चैट को स्वीकार करने से इनकार कर दिया गया था। इलाहाबाद हाई कोर्ट ने कहा कि ट्रायल कोर्ट ने न तो सामग्री की जांच की और न ही एडल्टरी के आरोप पर कोई खास मुद्दा बनाया।

    इलाहाबाद हाई कोर्ट ने ट्रायल कोर्ट को निर्देश दिया है कि वह एक पति को कथित एडल्टरी के आधार पर अपनी पत्नी की मेंटेनेंस की याचिका का विरोध करने के लिए कुछ वॉट्सऐप चैट रिकॉर्ड पर रखने की इजाजत दे। पत्नी पर लगे एडल्टरी के आरोपों पर अब इस आदेश के बाद नए सिरे से विचार होगा। हाई कोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि बिना पर्याप्त विचार के सबूत अस्वीकार करना कानूनी तौर पर उचित नहीं था।

    ट्रायल कोर्ट की ओर से वॉट्सऐप चैट रिकॉर्ड पेश किए जाने और एडल्टरी के आरोपों को मुद्दा न बनाए जाने के बाद पति ने हाई कोर्ट का रुख लिया। उसने याचिका दायर कर मामले में राहत की मांग की। पति की याचिका पर सुनवाई करते हुए जस्टिस मदन पाल सिंह ने कहा कि ट्रायल कोर्ट ने चैट को सिर्फ इसलिए स्वीकार करने से इनकार कर दिया था, क्योंकि पति ने इंडियन एविडेंस एक्ट की धारा 65बी के तहत सर्टिफिकेट जमा नहीं किया था। यह आमतौर पर इलेक्ट्रॉनिक सबूतों की स्वीकार्यता के लिए जरूरी होता है।

    हालांकि, हाई कोर्ट ने कहा कि फैमिली कोर्ट एक्ट की धारा-14 उन्हें कोई भी ऐसा सबूत लेने का अधिकार देता है जो किसी झगड़े को असरदार तरीके से सुलझाने में मदद कर सकता है। हाई कोर्ट ने साफ कहा कि भले ही ऐसा सबूत इंडियन एविडेंस एक्ट के तहत मान्य हो या नहीं।

    ट्रायल कोर्ट का फैसला किया रद्द
    हाई कोर्ट ने अपने आदेश में कीा कि इसलिए ट्रायल कोर्ट का 22 अगस्त 2025 का ऑर्डर कानून की नजर में टिकने लायक नहीं है। हाई कोर्ट ने तमाम बिंदुओं पर गौर करने के बाद ट्रायल कोर्ट के आदेश को रद्द कर दिया। कोर्ट ने कहा कि पार्टियों के वकील को सुनने और पार्टियों को ऐसे सबूत पेश करने की इजाजत दी जाए। मामले को असरदार तरीके से सुलझाने के लिए फैमिली कोर्ट एक्ट के सेक्शन-14 के तहत कोर्ट की मदद करने वाले सबूतों को देखा जाए। हाई कोर्ट ने आदेश में कहा कि मामले को नए सिरे से विचार के लिए ट्रायल कोर्ट को भेजा जाता है।

    10 हजार रुपये मेंटनेंस का आदेश
    दरअसल, मामले में ट्रायल कोर्ट की ओर से महिला के पति को हर माह 10 हजार रुपये मेंटनेंस देने का आदेश दिया था। पति ने ट्रायल कोर्ट के इस आदेश को हाई कोर्ट में चुनौती दी। हाई कोर्ट में पति ने तर्क दिया कि उसकी पत्नी किसी दूसरे आदमी के साथ ‘अडल्टरी’ में रह रही थी। यह क्रिमिनल प्रोसीजर कोड के सेक्शन-125 के तहत मेंटेनेंस से इनकार करने का एक आधार है। अपने दावे के समर्थन के लिए उसने अपनी पत्नी और दूसरे आदमी के बीच कथित तौर पर हुई वॉट्सऐप चैट पेश करने की कोशिश की।

    पति का कहना है कि वॉट्सऐप चैट ‘अश्लील’ किस्म की थीं। इस चैट उनके बीच फिजिकल रिलेशनशिप का इशारा कर रही थीं। पति की याचिका पर सुनवाई के क्रम में हाई कोर्ट ने कहा कि ट्रायल कोर्ट ने न तो मटीरियल की जांच की और न ही एडल्टरी के आरोप पर कोई खास मुद्दा बनाया।

    पति की याचिका को किया स्वीकार
    हाई कोर्ट ने कहा कि याचिकाकर्ता की खास दलीलों और सपोर्टिंग मटीरियल को देखते हुए रिकॉर्ड में मौजूद सबूतों पर विचार करने के बाद एक खास मुद्दा बनाया जाना चाहिए था। उस पर फैसला सुनाया जाना चाहिए था। पति की रिविजन याचिका को स्वीकार करते हुए हाई कोर्ट ने पहले के आदेश को रद्द कर दिया। कानूनी स्थिति साफ होने के बाद मामले को नए सिरे से विचार के लिए ट्रायल कोर्ट को वापस भेज दिया। अब ट्रायल कोर्ट दोनों पक्षों को सुनकर और आवश्यक साक्ष्य स्वीकार कर कानून के अनुरूप नया निर्णय देगा।

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