गाजियाबाद नगर निगम की अपील पर हाईकोर्ट के न्यायमूर्ति संदीप जैन ने कहा कि यह दिनदहाड़े न्यायिक हत्या है और ट्रायल जज का फैसला निरस्त किया गया। इस बारे में एक खबर के अनुसार हाईकोर्ट ने कहा है कि मृत व्यक्ति के खिलाफ पारित डिक्री कानून में शुरू से ही शून्य है। कोर्ट ने गाजियाबाद नगर निगम से जुड़े एक मामले में ट्रायल कोर्ट के फैसले को रद्द करते हुए उसे श्शून्य्य करार दिया है। कोर्ट ने संबंधित ट्रायल जज के आचरण पर भी गंभीर टिप्पणी की है।
कोर्ट ने कहा कि यह फैसला दिनदहाड़े की गई न्यायिक हत्या के समान है। कोर्ट ने ट्रायल कोर्ट के जज के विरुद्ध प्रशासनिक कार्रवाई हेतु मामला मुख्य न्यायाधीश को भेजने के निर्देश दिए हैं। यह आदेश न्यायमूर्ति संदीप जैन जी द्वारा गाजियाबाद नगर निगम की अपील पर पारित किया है। वादकर्ता इंद्र मोहन का दावा था कि वह आनंद इंडस्ट्रियल एस्टेट, गाजियाबाद के मालिक हैं। उन्होंने यह अधिकार 2022 में एक अन्य वाद में पारित एकपक्षीय डिक्री के आधार पर पाया था। नगर निगम की ओर से कहा गया कि जिस वाद में वादी का स्वामित्व घोषित था, उस वाद की प्रतिवादी सुशीला मेहरा की मृत्यु वर्ष 1996 में ही हो चुकी थी जबकि मुकदमा 2019 में दायर किया गया और 2022 में एकपक्षीय डिक्री पारित हुई। ऐसे में मृत व्यक्ति के विरुद्ध पारित डिक्री को न्यायालय ने पूर्णतरू शून्य माना।
देखना यह है कि इस मामले में उनके द्वारा ट्रायल जज के खिलाफ प्रशासनिक कार्रवाई हेतु मुख्य न्यायाधीश को लिखे पत्र पर क्या कार्रवाई होती है लेकिन फिलहाल इसे जनहित में पात्र को न्याय दिलाने और गलत निर्णय लेने की बढ़ रही प्रवृति पर अंकुश लगाने का महत्वपूर्ण प्रयास जरुर कह सकते हैं। आजकल लोग यह कहते सुने जाते हैं कि सही न्याय नहीं मिला जबकि अदालतों के प्रति आम आदमी के मन में जितना सम्मान है उसका अंदाजा आसानी से नहीं लगाया जा सकता। यह बना रहे इसके लिए हाईकोर्ट का यह फैसला सर्वमान्य और भविष्य में पात्रों को न्याय मिलने का मार्ग प्रशस्त करेगा। यह विश्वास से कहा जा सकता है।
(प्रस्तुतिः- रवि कुमार बिश्नोई संपादक दैनिक केसर खुशबू टाइम्स मेरठ)
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