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    Home»देश»आरोपी को सुनवाई बगैर बरी करना अवैध: हाईकोर्ट
    देश

    आरोपी को सुनवाई बगैर बरी करना अवैध: हाईकोर्ट

    adminBy adminFebruary 12, 2026No Comments2 Views
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    प्रयागराज, 12 फरवरी। हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण निर्णय में कहा है कि यदि आरोपी न्यायालय में उपस्थित होकर मुकदमे का सामना ही नहीं कर रहा है तो केवल शिकायतकर्ता की अनुपस्थिति के आधार पर सीआरपीसी की धारा 256 के तहत उसे बरी नहीं किया जा सकता। कोर्ट ने कहा कि ऐसी स्थिति में बरी करना कानून की प्रक्रिया का दुरुपयोग है। यह आदेश न्यायमूर्ति अवनीश सक्सेना ने चेक बाउंस के आरोपी राय अनूप प्रसाद की आठ याचिकाओं पर एकसाथ सुनवाई करते हुए दिया है। कोर्ट ने याची पर 50 हजार रुपये जुर्माना भी लगाया है जो उसे शिकायतकर्ता को देने होंगे।

    मामला आगरा की अदालत में लंबित परिवाद से जुड़ा था, जिसमें मजिस्ट्रेट ने शिकायतकर्ता की अनुपस्थिति के आधार पर आरोपी को बरी कर दिया था।जबकि रिकॉर्ड से स्पष्ट था कि आरोपी कभी भी मुकदमे की सुनवाई के लिए उपस्थित नहीं हुआ और न ही ट्रायल प्रारंभ हुआ.

    हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के विभिन्न फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि धारा 256 सीआरपीसी का उद्देश्य उस स्थिति में आरोपी को राहत देना है, जब वह नियमित रूप से अदालत में उपस्थित हो और शिकायतकर्ता जानबूझकर अनुपस्थित रहकर कार्यवाही में देरी कर रहा हो, लेकिन यदि आरोपी स्वयं ट्रायल से बच रहा हो, तो उसकी अनुपस्थिति में बरी किया जाना न्यायसंगत नहीं है.

    कोर्ट ने कहा कि समन वाद की प्रक्रिया आरोपी की उपस्थिति से प्रारंभ होती है. धारा 251 सीआरपीसी के तहत आरोप की जानकारी देना, धारा 254 के तहत साक्ष्य लेना और धारा 255 के तहत दोषसिद्धि या बरी का निर्णय तभी संभव है जब आरोपी ट्रायल का सामना करे. ऐसे में बिना ट्रायल के बरी करना विधिसम्मत नहीं है.

    कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि इस मामले में अपील (धारा 378 सीआरपीसी) के बजाय पुनरीक्षण (धारा 397/399 सीआरपीसी) उचित उपाय था, क्योंकि आरोपी ने कभी ट्रायल का सामना ही नहीं किया था और बरी करने का आदेश प्रथम दृष्टया अवैध था.

    रिकॉर्ड से यह भी सामने आया कि पुनरीक्षण अदालत द्वारा आदेश पारित किए जाने के बाद भी आरोपी लंबे समय तक सम्मन, जमानती वारंट और गैर-जमानती वारंट के बावजूद उपस्थित नहीं हुआ और सीधे धारा 482 सीआरपीसी के तहत हाईकोर्ट पहुंच गया. अदालत ने इसे न्यायिक प्रक्रिया में देरी करने का प्रयास माना.

    अंततः हाईकोर्ट ने आरोपी द्वारा दायर आठों याचिकाएं खारिज करते हुए 50,000 रुपये का संयुक्त जुर्माना शिकायतकर्ता को 30 दिन के भीतर अदा करने का निर्देश दिया. साथ ही शिकायतकर्ता की याचिका स्वीकार करते हुए आगरा की ट्रायल कोर्ट को निर्देशित किया कि सभी संबंधित मामलों की सुनवाई सुप्रीम कोर्ट के चेक बाउंस के मामलों में त्वरित सुनवाई के निर्देशों के अनुरूप शीघ्रता से पूरी की जाए.

    मामले के अनुसार शिकायतकर्ता गोपाल प्रसाद शर्मा ने अपने परिचित राय अनूप प्रसाद (याचिकाकर्ता) से 80 लाख रुपये में नोएडा में एक फ्लैट का सौदा किया. एडवांस के तौर पर 30 लाख रुपये दिए थे. बाद में सौदा पूरा नहीं हो पाया और याची ने शिकायतकर्ता को आठ चेकों के माध्यम से धनराशि वापस की मगर सभी चेक बाउंस हो गए. इसके बाद मामला अदालत में पहुंचा.

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