लखनऊ 30 जनवरी। हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच ने एक महत्वपूर्ण निर्णय देते हुए कहा है कि यदि कोई बैंक पुलिस के अनुरोध मात्र पर विधिक प्रक्रिया का पालन किए बिना किसी व्यक्ति या संस्था के बैंक खाते को फ्रीज करता है, तो ऐसे बैंक को उस व्यक्ति/संस्था को हुई वित्तीय हानि तथा प्रतिष्ठा को पहुंचे नुकसान के लिए सिविल और आपराधिक परिणामों का सामना करना होगा। न्यायालय ने इस संबंध में पुलिस व बैंकों के लिए विस्तृत दिशा-निर्देश भी जारी किया है।
यह निर्णय न्यायमूर्ति शेखर बी. सराफ व न्यायमूर्ति मंजीव शुक्ला की खंडपीठ ने खालसा मेडिकल स्टोर की ओर से इसके प्रोपराइटर यशवंत सिंह द्वारा दाखिल याचिका पर पारित किया है। याची का कहना था कि उसका एक्सिस बैंक में अकाउंट है, जिसे हैदराबाद के राचकोंडा पुलिस द्वारा जारी नोटिस के बाद फ्रीज कर दिया गया। नोटिस में कहा गया था कि संबंधित थाने में दर्ज साइबर फ्राड से संबंधित एक एफआईआर के पीड़ित के खाते से धोखाधड़ी कर पैसे इस खाते में ट्रांसफर किए गए थे।
कोर्ट ने कहा कि बैंक को जारी किए गए नोटिस में किसी भी राशि का ज़िक नहीं किया गया है. इसके अलावा बैंक की ओर अनुरोध किए जाने के बावजूद न तो एफआईआर की कॉपी उपलब्ध कराई गई और न ही कोई विधिवत् ज़ब्ती आदेश बैंक को प्रदान किया गया, ऐसे हालात में याची के खाते को फ्रीज नहीं रखा जा सकता. हाईकोर्ट ने संबंधित बैंक खाते को तत्काल डीफ्रीज करने का आदेश दिया.
कोर्ट ने कहा कि बैंक खाता फ्रीज करने की सूचना विवेचक को तत्काल बैंक या भुगतान सेवा प्रणाली के नोडल अफसर को भेजी जानी चाहिए ताकि वो अपने स्तर पर जरूरी कार्यवाही कर सकें. जैसे ही किसी बैंक को खाता ब्लॉक करने की सूचना भेजी जाती है तो बैंक को ये सूचना 24 घंटे के भीतर संबंधित क्षेत्राधिकार के न्यायिक मजिस्ट्रेट को भी भेजनी चाहिए.

