प्रयागराज, 22 जनवरी। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक आदेश में कहा है कि केवल इस आधार पर यह मान लेना कि सड़क दुर्घटना में जान गंवाने वाला छात्र था इसलिए कोई आय अर्जित नहीं कर रहा था, सही नहीं है। कोर्ट ने कहा कि ऐसे मामलों में मुआवजे की गणना मृतक को अकुशल श्रमिक मानकर की जानी चाहिए। कश्मीरी देवी व अन्य की याचिका पर सुनवाई करते हुए न्यायमूर्ति संदीप जैन ने कहा कि केवल इस कारण कि अंकित (मृतक) कक्षा 12वीं में पढ़ रहा था, यह अनुमान नहीं लगाया जा सकता कि वह कोई आय अर्जित नहीं कर रहा था।
यह स्पष्ट है कि दावेदार मृतक की आय और व्यवसाय से संबंधित कोई दस्तावेजी साक्ष्य प्रस्तुत नहीं कर सके इसलिए दुर्घटना दावा अधिकरण बुलंदशहर ने मृतक की काल्पनिक आय 15 हजार रुपये प्रतिवर्ष मानकर मुआवजे का निर्धारण किया, जो अत्यंत अपर्याप्त है। 10 जून 2014 को सड़क दुर्घटना में छात्र की मृत्यु हो गई थी। मोटर दुर्घटना दावा अधिकरण बुलंदशहर ने मृतक की मां, बहन और भाई को कुल दो लाख 60 हजार रुपये मुआवजा सात प्रतिशत वार्षिक ब्याज सहित देने का आदेश दिया। मुआवजा बढ़ाने के लिए हाईकोर्ट में अपील की गई। अपील में तर्क दिया गया कि मृतक की आयु 22 वर्ष थी। वह मजदूर के रूप में कार्य कर रहा था और लगभग नौ हजार रुपये प्रतिमाह कमा रहा था। यह भी कहा गया कि अधिकरण द्वारा मृतक की काल्पनिक आय 15 हजार रुपये प्रतिवर्ष मानना पूरी तरह गलत व अत्यंत कम है। यह भी दलील दी गई कि गुणक 16 लागू किया गया जबकि सही गुणक 18 होना चाहिए था।
गुरप्रीत कौर व अन्य बनाम यूनाइटेड इंडिया इंश्योरेंस कंपनी और जितेंद्र बनाम सादिया व अन्य मामलों पर भरोसा करते हुए कोर्ट ने कहा कि दिवंगत छात्र की मां ने यह साक्ष्य प्रस्तुत किया था कि उसका बेटा कक्षा 12वीं में पढ़ाई कर रहा था और नौ हजार रुपये प्रतिमाह कमा रहा था। कोर्ट ने कहा कि केवल छात्र होने से यह सिद्ध नहीं होता कि वह काम नहीं कर रहा था। यह स्थापित सिद्धांत है कि मृतक की आय व व्यवसाय से संबंधित कोई दस्तावेजी साक्ष्य उपलब्ध न हो तो अधिकरण को मृतक को अकुशल श्रमिक मानते हुए उस समय राज्य में प्रचलित न्यूनतम मजदूरी के आधार पर मुआवज़े का निर्धारण करना चाहिए, जो उस समय 6,362 रुपये प्रतिमाह थी।
इस आधार पर कोर्ट ने माना कि दावेदार 15 हजार रुपये प्रतिवर्ष की बजाय 6,362 रुपये प्रतिमाह के आधार पर मुआवजे के हकदार हैं। इसके अलावा नेशनल इंश्योरेंस कंपनी बनाम प्रणय सेठी एवं अन्य के फैसले का हवाला देते हुए कोर्ट ने कहा कि मृतक की आयु 22 वर्ष थी इसलिए गुणक 16 की बजाय 18 लागू किया जाना चाहिए था। यह भी कहा कि मृतक चार सदस्यीय परिवार का एकमात्र कमाने वाला सदस्य था। इन सभी तथ्यों को ध्यान में रखते हुए हाईकोर्ट ने मुआवजे की राशि बढ़ाकर 16,04,092 रुपये कर दी, जिस पर सात प्रतिशत वार्षिक ब्याज भी देना होगा।
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