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    Home»देश»हरीश राणा की इच्छामृत्यु पर सुप्रीम कोर्ट ने सुरक्षित रखा फैसला, 13 साल से होश में नहीं है
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    हरीश राणा की इच्छामृत्यु पर सुप्रीम कोर्ट ने सुरक्षित रखा फैसला, 13 साल से होश में नहीं है

    adminBy adminJanuary 15, 2026No Comments14 Views
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    नई दिल्ली 15 जनवरी। सुप्रीम कोर्ट ने 13 साल से अचेत स्थिति में बिस्तर पर पड़े गाजियाबाद के रहने वाले हरीश राणा को पैसिव यूथेनेसिया (इच्छामृत्यु) देने वाली याचिका पर फैसला सुरक्षित कर लिया है. पिछली सुनवाई के दौरान शीर्ष अदालत ने हरीश के घरवालों से भी बात की थी. हरीश पिछले 13 सालों से जिंदा लाश बना हुआ है. वो न हिल पाता है और न बोल पाता है. उसके माता-पिता ही अपने बेटे की इच्छामृत्यु की याचिका लेकर सर्वोच्च अदालत में पहुंचे थे. 100 फीसदी दिव्यांगता के शिकार हो चुके हरीश पर पूरी सुनवाई के बाद शीर्ष अदालत ने अपना फैसला रिजर्व कर लिया है.

    इस मामले की सुनवाई सो पहले दोनों जस्टिस ने हरीश के माता-पिता से मुलाकात की। अदालत ने कहा कि यह इतना बेहद संवेदनशील मामला है कि इसमे फैसला सुनान बहुत कठिन है। अदालत ने यह भी कहा कि हम सभी इंसान हैं किसी भी मामले में यह तय करना कि कौन जिंदा रहे और कौन नहीं यह तय करना आसान नहीं होता। इसलिए इस फैसले को सुरक्षित रख लिया जता है। अगली तारीख पर अब अदालत इस मामले में आपना फैंसला सुनाएगी।

    हरीश राणा अपने परिवार के साथ दिल्ली में रहते हैं। 2013 में वह चंडीगढ़ यूनिवर्सिटी में सिविल इंजीनियरिंग की पढ़ाई के दौरान रक्षाबंधन के दिन चौथी मंजिल से गिर गए थे। पीजी की चौथी मंजिल की बालकनी से गिरने के बाद हरीश के सिर में काफी चोट आई थी। इसके बाद हरीश ने आखें तो खोली लेकिन शरीर का कोई हिस्सा नहीं चल सका। इसके बाद से हरीश 13 साल बाद भी इसी स्थिति में हैं। हरीश हिल-डुल नहीं पाते खाने के लिए उनके गले से पेट तक के लिए ट्यूब डाली गई है। इस दुर्घटना के बाद और पिछले 13 साल में हरीश की हालत ने इनके परिवार को पूरी तरह से तोड़ दिया है। आर्थिक रूप से और मानसिक रूप से परिवार जैसे हर दिन टूट रहा है।

    इलाज के लिए परिवार ने दिल्ली में स्थित अपना घर तक बेच दिया और गाजियाबाद में रहने लगे। परिवार में दो और बच्चे हैं उनकी भी जिम्मेदारी यह परिवार निभा रहा है। इतने लंबे समय बाद भी जब हरीश की हालत में कोई सुधार नहीं हुआ और चिकित्सकों ने उसके ठीक होने की सारी उम्मीद छोड़ दी तो परिवार ने सुप्रीम कोर्ट में एक विनती डालते हुए इच्छा मृत्यु की मांग की। परिवार ने हाइकोर्ट में पैसिव यूथेनेशिया की इजाजत मांगी थी लेकिन हाईकोर्ट ने यह याचिका खारिज कर दी थी. कोर्ट का कहना था कि हरीश किसी मशीन से पूरी तरह जुड़े नहीं हैं और उनका शरीर बुनियादी काम मेडिकल मदद से कर रहा है। कोर्ट ने यह भी कहा था कि अगर खाने की सप्लाई बंद कर दी जाए तो इसे एक्टिव यूथेनेशिया माना जाएगा जो भारत में गैरकानूनी है।

    जब हाइकोर्ट से कोई राहत नहीं मिली तो 2025 में हरीश के माता-पिता ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया। सुप्रीम कोर्ट जाते हुए हरीश के माता-पिता ने कहा था कि हरीश की हालत और अधिक खराब होती जा रही है। उसे सिर्फ मशीनों के सहारे जबरन जिंदा रखा जा रहा है। इस पर कोर्ट ने एक मेडिकल टीम बनाकर पूरे मामले की जानकारी रिपोर्ट मांगी थी। मेडिकल टीम ने भी अपनी रिपोर्ट में कहा था कि हरीश के ठीक होने की कोई उम्मीद नहीं है। इसके बाद 18 दिसंबर को जस्टिस जेबी पारदीवाला ने मामले की गंभीरता को देखते हुए 15 जनवरी को फैसला सुनाने की तारीख तय की थी। गुरुवार आज इस मामले में फैसला सुनाया जाना था लेकिन अदालत ने फैसले को सुरक्षित रख लिया है।

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