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    Home»देश»टीएन शेषन द्वारा सुधार की शुरूआत का मजबूत असर दिखाई देने लगा, शादी के बाद लड़कियों के ससुराल में वोट बनाने की व्यवस्था करे निर्वाचन आयोग, मतदाता सूचियों का पुननिरीक्षण गलत नहीं है लेकिन कोई भी मतदान से वंचित ना रहे
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    टीएन शेषन द्वारा सुधार की शुरूआत का मजबूत असर दिखाई देने लगा, शादी के बाद लड़कियों के ससुराल में वोट बनाने की व्यवस्था करे निर्वाचन आयोग, मतदाता सूचियों का पुननिरीक्षण गलत नहीं है लेकिन कोई भी मतदान से वंचित ना रहे

    websitemarketing2019@gmail.comBy websitemarketing2019@gmail.comJanuary 8, 2026No Comments8 Views
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    मतदाता सूचियों को त्रुटिविहीन बनाने और गलत वोटों को कटवाने के लिए चल रही जांच व्यवस्था को लेकर जहां सत्ताधारी दल इसके समर्थन में खड़ा नजर आ रहा है वहीं विपक्ष द्वारा विभिन्न तरीकों से इसका भरपूर विरोध किया जा रहा है।
    भारत जैसे विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र में निष्पक्ष चुनाव कराना रेत में सुई ढूंढने के समान ही कह सकते हैं क्योकि बाहुबल तो कहीं धनबल व जनबल के माध्यम से चुनाव लड़ने जीतने की परंपरा चली आ रही थी उसमें कुछ दशक पूर्व निर्वाचन आयुक्त टीएन शेषन ने पहली बार में ही सुधार का जो बीड़ा उठाया उसने सुधार के मामले में लगभग पूर्ण रूप से सफलता मिली थी क्योंकि उस बार चुनावों में बाहु जन और धनबल के नाम पर चुनाव कोई प्रभावित नहीं कर पाया था। अब वैध मतदाताओं के दम पर चुनाव कराने की जो प्रक्रिया जो चल रही है उसे लेकर काफी सवाल उठ रहे हैं। जहां तक पिछले पांच दशक में देखा है अक्षरत तो कहीं कुछ भी सही नहीं होता कारण कुछ भी हो। मगर कोई प्रयास शुरू होता है तो सुधार तो होते ही है। लेकिन वर्तमान में एसआईआर अभियान से जो सही गलत की समीक्षा कर अवैध मतदाताओं को छांटा जा रहा है उसे तो गलत नहीं बताया जा सकता मगर मिसिंग वुमेन वोटर्स के हिसाब से देखें तो लैगिंग अनुपात गिरकर रह गया। परिणामस्वरूप २३ लाख अतिरिक्त मिसिंग वुमेन वोटर्स कहां है। यह गिरावट संयोग नहीं की जा सकती। बताते हैं कि यह किसी एक राज्य जिले या अधिकारी की गलती भी नहीं लगती। यह भी कहा जा सकता है कि जो लोग कह रहे हैँ कि यह व्यवस्थित प्रक्रिया का संकेत देती है जिससे महिलाओं को गैर मौजूद बताकर वोटर लिस्ट से जानबूझकर हटाया जा रहा है उसे भी सही नहीं कह सकते। लेकिन एक तथ्य सामने आ रहा है कि शादी से पूर्व मायके में वोटर बनी लड़कियों का विवाह होने पर उनके मायके से तो वोट हटा दिए गए लेकिन ससुराल के पते पर जोड़ी नहीं गई परिणामस्वरूप महिला वोटरों की संख्या में कमी आने की बात से इनकार नहीं किया जा सकता।
    देश में कई सालों के प्रयास के बावजूद भी महिलाओं की राजनीतिक भागीदारी अभी तय नहीं हो पाई है। मेरा मानना है कि दुनिया की आधी आबादी के वोटों का कम होना समाज में कई प्रकार की समस्याओं का खड़ा होने का सूचक कह सकते हैं क्योंकि नीति निर्माण और उसे लागू कराने के मामले में महिलाओं का बहुत बड़ा योगदान है। ऐसे में स्वास्थ्य शिक्षा पोषण सुरक्षा जैसे मुददे उतने अच्छी प्रकार से लागू नहीं हो सकते जितना होने चाहिए क्योंकि प्रतिनिधि के रूप से देखें तो निर्णय लेने का अधिकार महिलाओं के वोट कम होने के चलते पुरूषों के हाथो में पहुंच जाता है क्योंकि वोट देने का अधिकार समाप्त होने से महिलाएं जो अभिव्यक्ति सत्ता में अधिकार प्राप्त होने से दे सकती है वो नहंी दे पाती। हो सकता है लोकतंत्र से बाहर की जा रही महिलाओं के जो स्लोगन उभारे जा रहे है वो पूरे सच ना हो लेकिन देश में महिलाओं को पूजनीय और उसका निर्देश कथन सभी को मानना होता है इस बात को ध्यान में रख्रते हुए लोकतांत्रिक रूप से मतदाता सूचियों से गलत नाम भी कटे लेकिन इस बात का ध्यान नीति निर्धारकों को रखना होगा कि नए युवा मतदाता बनने से वंचित ना हो और सही वोट नहीं कटने चाहिए। अगर कुछ लोगों के काट दिए गए हैं तो उन्हें दोबारा से मतदाता बनाया जाए और निर्चाचन आयेाग यह तय करे कि जिन महिलाओं के वोट शादी के बाद मायके से कट चुके हैं उन्हें ससुराल में उनके वोट बनाना सुनिश्चित हो। मेरा मानना है कि भले ही दस दोषियों पर कार्रवाई ना हो लेकिन एक निर्दोष पर कार्रवाई ना हो उसी प्रकार सही मतदाताओं के नाम ना कटे। भारत निर्वाचन आयोग को इस जिम्मेदारी का ध्यान रखना होगा कि लोकतंत्र में अपनी भागीदारी के लिए वोट डालने का मौका हर किसी को मिले। मुझे लगता है कि मतदान से पूर्व पता चलता है कि सही व्यक्ति वोट नहीं बनवा पाया तो उससे पत्रावली लेकर उसका वोट बनाकर वोट देने का अधिकार तो मिलना ही चाहिए।
    (प्रस्तुतिः- रवि कुमार बिश्नोई संपादक दैनिक केसर खुशबू टाइम्स मेरठ)

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    August 13, 2026

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