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    Home»देश»नागरिकता को लेकर डरना नहीं समझना जरूरी! नागरिकता की पहेली, पासपोर्ट का सच और डिजिटल सुधार की डगर
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    नागरिकता को लेकर डरना नहीं समझना जरूरी! नागरिकता की पहेली, पासपोर्ट का सच और डिजिटल सुधार की डगर

    websitemarketing2019@gmail.comBy websitemarketing2019@gmail.comJune 25, 2026No Comments15 Views
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    भारत में नागरिकता हमेशा से केवल एक कानूनी शब्द नहीं, बल्कि एक गहरा भावनात्मक और संवैधानिक विषय रहा है। हाल ही में विदेश मंत्रालय द्वारा पासपोर्ट को लेकर दी गई एक तकनीकी स्पष्टीकरण और गृह मंत्रालय द्वारा जारी नागरिकता (संशोधन) नियम, 2026 ने इस बहस को एक बार फिर देश के मुख्य विमर्श में ला खड़ा किया है। संपादकीय पन्नों पर आज सबसे बड़ा सवाल यही तैर रहा हैआखिर भारत में नागरिकता का अंतिम और अकाट्य प्रमाण क्या है?
    पासपोर्ट: पहचान का संबल या नागरिकता का अकाट प्रमाण ?हाल ही में विदेश मंत्रालय के अधिकारियों ने एक बेहद बारीक लेकिन महत्वपूर्ण कानूनी स्थिति साफ की। उन्होंने रेखांकित किया कि पासपोर्ट प्राथमिक रूप से एक श्यात्रा दस्तावेज्य है। हालांकि यह विदेशों में भारतीय राष्ट्रीयता को प्रमाणित करता है और इसके बिना अंतरराष्ट्रीय यात्रा संभव नहीं है, लेकिन घरेलू कानूनी लड़ाइयों में इसे नागरिकता का अंतिम या अकाट प्रमाण नहीं माना जा सकता।
    यह बात आम जनता के लिए हैरान करने वाली हो सकती है, जो यह मानती आई है कि जिस दस्तावेज पर भारत सरकार और राष्ट्रीयता में भारतीय लिखा हो , उससे बड़ा प्रमाण क्या होगा? लेकिन कानून की नजर में सरकार के पास यह अधिकार सुरक्षित रहता है कि यदि किसी ने गलत तथ्यों या धोखाधड़ी से पासपोर्ट हासिल किया है, तो उसे निरस्त किया जा सकता है। अदालतें भी नागरिकता तय करते समय केवल एक दस्तावेज पर निर्भर रहने के बजाय पूरे साक्ष्यों को देखती हैं।
    जब देश में वोटर आईडी, आधार और अब पासपोर्ट को भी नागरिकता का अंतिम प्रमाण मानने से तकनीकी इंकार किया जाता है, तो आम नागरिक का संशय में पड़ना स्वाभाविक है। देश में किसी एकल श्राष्ट्रीय नागरिकता कार्ड्य का न होना इस पहेली को और पेचीदा बनाता है।
    डिजिटल गवर्नेंस की दिशा में कदमः नागरिकता नियम 2026 ,इसी विमर्श के बीच, सरकार ने नागरिकता नियम, 2026 को अधिसूचित कर एक बड़ा प्रशासनिक सुधार किया है। ये नए नियम मुख्य रूप से हमारे वैश्विक प्रवासी कार्यबल और ओवरसीज सिटीजन ऑफ इंडिया कार्डधारकों को ध्यान में रखकर तैयार किए गए हैं। इसके मुख्य बिंदु भारत की नागरिकता व्यवस्था को आधुनिक बनाने की दिशा में अहम हैं:
    पूर्णतः डिजिटल प्रक्रिया अब ओसीआई पंजीकरण और इसे त्यागने की पूरी प्रक्रिया ऑनलाइन पोर्टल के जरिए होगी। कागजातों की दो-दो प्रतियां जमा करने की पुरानी औपनिवेशिक व्यवस्था को खत्म कर दिया गया है। डिजिटल ओसीआई सर्टिफिकेट जारी करने का प्रावधान किया गया है।
    दोहरे पासपोर्ट पर कड़ा रुखः नए नियमों ने साफ कर दिया है कि कोई भी नाबालिग बच्चा भारतीय पासपोर्ट रखने के साथ-साथ किसी अन्य देश का पासपोर्ट एक ही समय पर नहीं रख सकता। भारत में दोहरी नागरिकता का प्रावधान नहीं है, और यह नियम इसी मूल भावना को मजबूत करता है।
    फास्ट ट्रैक इमिग्रेशन : नए आवेदकों को बायोमेट्रिक डेटा साझा करने की सहमति देनी होगी, जिससे अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डों पर उनके आने-जाने की प्रक्रिया बेहद सुगम हो जाएगी।
    संतुलन की आवश्यकता
    एक तरफ जहाँ नागरिकता नियमों को डिजिटल बनाकर (डिजिटल इंडिया विजन के तहत) प्रवासियों के लिए प्रक्रिया पारदर्शी और आसान की जा रही है, वहीं दूसरी तरफ देश के भीतर नागरिकता साबित करने के मानकों को लेकर स्पष्टता की कमी दिखती है। आधार को लेकर भी सर्वोच्च न्यायालय में यह याचिकाएं लंबित हैं कि इसे केवल पहचान का जरिया माना जाए, नागरिकता या पते का अकाट्य सबूत नहीं।
    समय आ गया है कि सरकार और न्यायपालिका मिलकर इस कानूनी असमंजस को दूर करें। यदि पासपोर्ट, आधार और वोटर आईडी जैसी गहन जांच के बाद बनने वाली कड़ियाँ भी किसी नागरिक को पूर्ण वैधानिक सुरक्षा नहीं देतीं, तो एक स्पष्ट, पारदर्शी और सर्वमान्य श्नागरिकता दस्तावेज मार्गदर्शिका्य जारी की जानी चाहिए। प्रशासनिक दक्षता और तकनीकी सुधार सराहनीय हैं, लेकिन इनके साथ-साथ देश के भीतर रह रहे हर वैध नागरिक के मन से श्पहचान के संकट्य का डर दूर करना भी संप्रभु राज्य का ही दायित्व है।
    (प्रस्तुतिः- रवि कुमार बिश्नोई संपादक दैनिक केसर खुशबू टाइम्स मेरठ)

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