आजकल हीटवेब गर्मी को लेकर दी जा रही सलाह के तहत 25 मई से 2 जून तक तपने वाली धरती और आसमान को नौतपा कहकर नागरिकों को जागरूक किया जा रहा है कि वो गर्मी से बचें घर से लगभग 10 से 4 बजे तक जितना हो सके कम ही निकले और बाहर जरूरी हो तभी निकलें। बताते है कि ज्येष्ठ माह में सूर्य धरती के निकट होता है उस दौरान उसकी किरणें सीधे जमीन पर पड़ने से गर्मी अत्यधिक बढ़ जाती है। हर स्तर से नागरिकों को जागरूक करने के प्रयास खूब हो रहे है। और लोगों को सलाह दी जा रही है कि उन्हें क्या क्या करना चाहिए और क्या नहीं। मगर मेरा मानना है कि मेहनत कश लोगों के लिए तो चाहे तापमान 45 हो या 50 उसे तो रोटी जुटाने के लिए काम करना ही है। हां जो बड़े लोग है और इस समय काम न करके भी गुजारा चला सकते है उनके लिए यह एडवाईजरी सही है। हां सरकार और प्रशासन को चाहिए कि इस नौतपा में खेतों पर काम करने रिक्शा चलाने अन्य मजदूरी जैसे कार्यों में संलग्न व्यक्ति जहां तक मुझे लगता है वो काम तो नहीं छोड़ सकते क्योंकि यह शायद हर साल ही होता है क्योंकि मैं भी सड़क पर ही रहता हूं गर्मी भी लगती है इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता। मुझे लगता है कि मेहनतकश मजदूर को इस गर्मी से बचाने के लिए जिम्मेदार समाजसेवी संगठनों आदि के माध्यम से एक अपील जारी कर गांव के गली मौहल्लों शहर के चौराहों बाजारों आदि में मीठा नीबू का ठंडा पानी अथवा शरबत वितरण इन नौ दिन में करा दें और जगह जगह थका हारा मजदूर थोड़ा सुस्ता सके इसके लिए कुछ टेंट की छतें बनवा दी जाए तो मुझे लगता है कि वो गर्मी से भी बचें रहेंगे और अपना काम भी कर पाएंगे। यह सुझाव है कि जो होना है वो होकर रहेगा मगर नौतपा जैसे मौकों पर सीधे सीधे एडवाईजरी जारी कर आम आदमी को गर्मी को लेकर जो डर बैठता है उससे बचाने के लिए सरल भाषा में सुझाव के लिए पेश किया जाए तो अच्छा है। मैंने बचपन में ईंट भट्टों पर लेबर का काम किया सड़कों पर चाय के प्यालें धोए मजदूरी करी रिक्शा चलाई लेकिन मुझे कभी नौतपा का नाम सुनने को नहीं मिला और ना ही अहसास हुआ क्योंकि यह हर साल आता इसलिए डराने की बजाए समझाने का काम हो।
वैसे तो हर कोई अपने फन का माहिर है। बिजली विभाग में लाखों कर्मचारी अधिकारी मौजूद हैं और ज्यादातर अपने काम को जिम्मेदारी से कर रहे होंगे। आज एक खबर पढ़ने को मिली कि ट्रांसफार्मर को ठंडा रखने के लिए कूलिंग सिस्टम लागू किया गया। पहले भी किया जाता रहा होगा लेकिन सुनने को नहीं मिले। मुझे लगता है कि ट्रांसफार्मर की कूलिंग करने से ग र्मी का प्रकोप किसी को बख्शने वाला नहीं है तो सवाल है कि हो क्या। तो कहा जा सकता है कि चार उपभोक्ताओं पर ३६० पुलिसकर्मी जर्जर बिजली के तार और खंभे आखिर सुधार कैसे हो। जब अटल बिहारी वाजपेयी प्रधानमंत्री थे तो दिल्ली में सरोजिनी नगर में बिजली चार घंटे नहीं आई। राजधानी में इतना बड़ा संकट उस समय था तो जानकारी मिली कि जो उत्पादन बिजली का है वो खपत के मुकाबले कम है। जब तक उसकी पूर्ति नहीं होगी इस समस्या का समाधान नहीं हो सकता। फिलहाल जो समस्या सिर पर खड़ी है उससे यह खबर फैलाकर कि नौतपा शुरु हो गया है समस्या का समाधान होने वाला नहीं है। इसके लिए जरुरी है कि बिजली खर्च कम से कम हो। नागरिकों को हर माह बिल देना पड़ता है इसलिए वो पूरी कोशिश करते हैं लेकिन सरकारी कार्यालयों, पंचायत अधिकारी से लेकिन बड़े अधिकारियों के खाली कमरे में कूलर एसी पंखे चलते हैँ उन पर प्रतिबंध लगाया जाए क्योंकि यहां होने वाली बर्बादी रोक दी गई तो काफी हद तक यूपी के सीएम की भावनाओं के तहत बिजली आपूर्ति यूपी में ही नहीं सारे देश में बनी रह सकती है। आवश्यकता फिजूलखर्ची सरकारी कार्यालयों और जनप्रतिनिधियों के यहां जो हो रही है उसे रोका जाए। अगर सरकार को लगता कि लोगों को घर से नहीं निकलना चाहिए तो वो तभी संभव है जब लॉकडाउन जैसी व्यवस्था हो क्योंकि बच्चों को पालने के लिए गरीब मजदूर गर्मी की चिंता तो नहीं करेगा लेकिन लॉकडाउन में समाजसेवी जरुरतंमंदों के घर खाना पहुंचाने में अब भी पीछे नहीं रहेंगे जिस प्रकार कोरोना में पहुंचाया गया था। फिर भी एक बात कही जा सकती है कि कोरोना का गलत उपयोग कुछ लोगों ने किया ऐसी स्थिति ना आए इसलिए गर्मी से बचाव बिजली की फिजूलखर्ची रोककर ही किया जा सकता है। समाजसेवी तो कहीं प्याऊ लगवा रहे हैं तो कहीं शरबत बांट रहे हैं। तरल पदार्थ तो मिलते ही रहेंगे कुछ लोग आश्रय स्थल बनवा सकते हैँ क्योंकि वो छप्परनुमा हट ठंडी रहती है और प्यास कम लगती है। कुल मिलाकर गर्मी या नौतपा के नाम पर डराने की बजाय आम आदमी को राहत देने की व्यवस्था की जाए तो ज्यादा सफल रहेगा लेकिन नौतपा नौतपा चिल्लाया गया तो एसी कूलर और पंखों की बिक्री बढ़ेगी और इनसे संबंध उद्योगपतियों का लाभ जो बढ़ेगा हो सकता है उसका कुछ प्रतिशत अन्य लोगों को मिल जाए लेकिन गर्मी की समस्या हल नहीं हो पाएगी। आज से नौतपा शुरु हुआ लेकिन गढ़ गंगा ब्रजघाट प्रयागराज में गंगा दशहरा पर पहले से भी ज्यादा भीड़ उमड़ी जो इस बात का प्रमाण है कि इसका कोई फर्क नहीं पड़ रहा है।
(प्रस्तुतिः- रवि कुमार बिश्नोई संपादक दैनिक केसर खुशबू टाइम्स मेरठ)
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